हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में लिंग संवेदनशीलता पर एक दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर ने किया। प्रदेश न्यायिक अकादमी (एसएलए) की ओर से करवाए गए सम्मेलन में मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि प्राचीन समय में महिलाओं को जीवन के सभी क्षेत्रों में पुरुषों के साथ बराबर का दर्जा प्राप्त था।
परंतु महिलाओं की स्थिति मध्ययुगीन काल में पुरुष प्रधान समाज में काफी नीचे चली गई। आजादी के बाद लैंगिक समानता के सिद्धांत को भारतीय संविधान में निहित किया गया। बावजूद महिलाओं को अभी भी विभिन्न क्षेत्रों में पुरुषों को नीचा माना जाता है।
एक न्यायाधीश को अदालत में आने वाले सभी वादियों खास कर महिलाओं की गरिमा का विशेष ख्याल रखना चाहिए। महिलाओं ज्यादा से ज्यादा कानूनी सहायता प्रदान की जानी चाहिए तथा अदालत में आयी महिलाओं के मामलों को प्राथमिकता के आधार पर जल्दी से निपटारा करना चाहिए।
न्यायमूर्ति राजीव शर्मा ने कहा कि सम्मेलन का उद्देश्य समाज में प्रचलित लिंग पूर्वाग्रहों को समझना और गर्भ में लिंग जांच की बुराई तथा उसके आर्थिक परिणामों को उजागर करना है। सम्मेलन के दौरान 117 न्यायिक अधिकारिओं और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय और एपीजी यूनिवर्सिटी के विधि विभाग के लगभग 30 छात्रों ने भाग लिया।
इस अवसर पर न्यायमूर्ति संजय करोल, न्यायमूर्ति त्रिलोक सिंह चौहान, न्यायमूर्ति पीएस राणा एवं न्यायमूर्ति सुरेश्वर ठाकुर, न्यायमूर्ति मंजू गोयल, न्यायमूर्ति बशीर ए किरमानी, और दिल्ली विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. वीके दीक्षित मौजूद रहे।