यही कारण है कि विनिंग एबिलिटी यानी जीत का मादा रखने वाले नेताओं को ही टिकट देने की रणनीति अपनाई जा रही है। संगठन स्तर पर साफ संकेत दिए गए हैं कि व्यक्तिगत सिफारिशों या दबाव के बजाय केवल जमीनी मजबूती और जनसमर्थन को आधार बनाया जाएगा। हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं और नगर निकायों के चुनाव मई माह में प्रस्तावित हैं। ऐसे में भाजपा ने अभी से चुनावी मोर्चाबंदी शुरू कर दी है। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया जा रहा है और संभावित उम्मीदवारों की रिपोर्ट भी जुटाई जा रही है। जिलों से लेकर मंडल स्तर तक बैठकों का दौर शुरू हो गया है।
प्रभारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे स्थानीय नेताओं, कार्यकर्ताओं और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए पैनल तैयार करें। इसके अलावा, पिछली बार हार-जीत के आंकड़ों का भी विश्लेषण किया जा रहा है, ताकि कमजोर कड़ियों को दूर किया जा सके। भाजपा की यह रणनीति कांग्रेस से पहले मैदान में बढ़त बनाने की कोशिश के तौर पर देखी जा रही है। पार्टी का मानना है कि समय रहते मजबूत उम्मीदवारों की पहचान कर उन्हें मैदान में उतारने से चुनाव में बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। पार्टी नेताओं को यह भी निर्देश दिए गए हैं कि वे उम्मीदवार चयन के साथ-साथ स्थानीय मुद्दों को भी प्रमुखता दें। विकास कार्य, बुनियादी सुविधाएं और जनता से सीधा संवाद, इन सबको चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बनाया जाएगा।