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मजदूरों ने बताया, कैसे गुजरे टनल में वो खौफनाक '10 दिन'

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मौत को मात देकर टीहरा टनल से दसवें दिन निकले मजदूरों सतीश तोमर और मणिराम ने पहाड़ के नीचे बिताए एक-एक पल को सार्वजनिक किया। मजदूरों ने कहा कि मिट्टी-अखबार खाकर और भजन-कीर्तन कर उन्होंने जिंदगी की जंग जीती।
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हादसे के चौथे दिन उम्मीद टूटने लगी थी लेकिन एक आवाज ने जीने की चाह पैदा कर दी। भगवान ने उनकी परीक्षा ली, जिसमें वे सफल हो गए। उन्होंने बताया कि बचाव टीम के साथ संपर्क स्थापित होने पर उन्होंने जो भी मांगा वह उन्हें चार इंच के पाइप से मिलता रहा।

मनोरंजन के लिए मोबाइल भेजा गया, जिसमें भजन डाउनलोड हुए थे। लेकिन, उन्होंने रोमांटिक गाने मांगे। डिमांड पर उन्हें वह भी मुहैया करवाए गए। सतीश और मणिराम ने मंगलवार को बिलासपुर अस्पताल में पत्रकारों से बताया कि 12 सितंबर की रात को वह अपने साथियों सहित काम कर रहे थे।
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ऐसे आई आफत

एकाएक कुछ गिरने की आवाज आई। लाइटें बंद हो गईं। पीछे हटे तो चारों ओर घुप अंधेरा था। कुछ समझ पाते, इससे पहले ही बाहर जाने का रास्ता बंद हो गया था। उनके साथ मणिराम भी फंसे थे। टनल में फंसने के बाद उन्होंने सबसे पहले पीने के पानी के लिए पाइप खोल दिया। हवा का पाइप अपने नजदीक कर दिया। मोटे गत्ते और अखबार जुटा लिए।

सूत की बोरी से मशाल बना ली। मोबाइल की लाइट और टॉर्च से काम चलता रहा। नींद कम आती थी। भूख मिटाने के लिए मुलायम मिट्टी और अखबार खाए। चौथे दिन बाहर निकलने की उम्मीद कम होने लगी लेकिन पहाड़ से आई एक आवाज ने उन्हें हौसला दिया। टनल में पानी काफी भर गया था। मशीन के ऊपर ही वक्त गुजारा। मणिराम ने बताया कि सतीश ने टनल के भीतर उन्हें काफी सहारा दिया।

दोनों ने सुख-दुख की बातें कीं। चौथे दिन जब आवाज आई तो उन्हें भगवान पर पूरा भरोसा हो गया। मणिराम ने बताया कि भगवान की कृपा और लोगों की दुआ से वे सुरक्षित बाहर निकले हैं। नवजीवन के लिए उन्होंने प्रशासन का भी आभार जताया।

न खुद हिम्मत हारी, न साथी को हारने दी

सुरेश तोमर/आदेश शर्मा-बिलासपुर अस्पताल में उपचाराधीन सतीश ने अमर उजाला से फोन पर बातचीत करते हुए कहा कि हिम्मत हारने का मतलब सिर्फ और सिर्फ मौत था। कभी हिम्मत नहीं हारी और न ही साथी मणिराम को हारने दी। सतीश ने बताया कि 16 सितंबर को बाहर से माइक्रोफोन और सीसीटीवी पहुंचे।

इसके बाद खाने की सामग्री और दवाइयां मिलीं। जूस पहुंचने पर पहले साथी मणिराम को पिलाया। ड्रिलिंग की आवाज बंद होने और बारिश से रेस्क्यू में खलल का आभास उन्हें भी हो रहा था। टनल में पानी भरने से चिंता बढ़ रही थी।

हर साल 21 सितंबर को मनाऊंगा जन्मदिन
सतीश कहते हैं कि नया जीवन मिलना परिजनों, प्रभु और समस्त देवभूमि वासियों की दुआओं का असर है। मां की बात सही है। ये दूसरा जन्म ही तो मिला है। अब हर वर्ष 21 सितंबर को जन्मदिन मनाऊंगा।

भाई, रिश्तेदारों को भी हिम्मत बंधाते रहे सतीश

रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान बिलासपुर में डटे बड़े भाई विनोद तोमर, दलीप, अनिल तोमर, जितेंद्र, पोभार और नाथू राम चौहान ने कहा कि सतीश की हिम्मत उसके काम आई। सतीश के टनल से बाहर निकलते ही सभी ने उसे गले लगाया। इस दौरान आंसू भी छलक आए। लेकिन, सतीश सभी को दम रखने की बात कहता रहा।

बुआ से नाराज कैसे रह सकता हूं
सतीश ने मंगलवार को मां गीता देवी से बात करते हुए कहा मां और दादी की हिम्मत बंधाई। पिता श्याम सिंह, दादी बिशनी देवी, बहने वीना और रीना से बात कर कहा - देखो शिरगुल देवता का आशीर्वाद और आपकी दुआएं काम कर गईं।

बुआ निर्मला देवी और इंदू तोमर से कहा - बुआ छुट्टी में घर आया था। निर्मला बुआ को टौरू बुलाया था। नहीं आईं तो नाराज था। इसलिए लौटते वक्त फोन भी नहीं किया। पर अपनी बुआ से ज्यादा देर तक नाराज कैसे रह सकता हूं।

डीसी बोलीं -ये बेहद टेक्निकल काम था

टीहरा में टनल धंसने के तुरंत बाद रेस्क्यू ऑपरेशन युवा डीसी मानसी सहाय ठाकुर के नेतृत्व में चला। खुद इंजीनियरिंग से स्नातक मानसी आखिरी दिन तक पूरी टीम के साथ मोर्चे पर डटी रहीं। अमर उजाला ने डीसी मानसी से लम्बी बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश :

सवालः घटना की खबर लगते ही सबसे पहले आपने क्या किया?
जवाबः मैं तुरंत मौके पर पहुंची। कंपनी के कर्मचारी मलबा निकाल रहे थे। पुलिस को सूचना दी। लोग भी जुट गए। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को बुलाया गया।

सवालः तुरंत एनडीआरएफ और सेना की मदद क्यों नहीं ली गई? जबकि ऐसे मामलों में पहला काम यही होता है?
जवाबःघटना के तीसरे दिन सेना और एनडीआरएफ टीम बुलाई गई। लेकिन मैं सेना से घटना के दिन से ही संपर्क में रही।

सवालःफिर एनडीआरएफ और सेना की टीम आई और तुरंत हाथ खड़ा कर लौट क्यों गई?
जवाबःएनडीआरएफ क्या टनल बना सकती है? यह कार्य तकनीकी था। मजदूरों को निकालने के लिए टनल बनानी थी। इस बारे में उन्होंने लिखकर भी दिया है। जब उनकी जरूरत हुई तो उन्हें बुलाया गया।

सवालःबीआरओ पर इतने भरोसे का आधार क्या था?
जवाबःस्थिति को देखने के बाद आभास हुआ था कि यह कार्य तकनीकी है। इसके लिए बीआरओ के ब्रिगेडियर मनोज से बात हुई। उन्होंने तुरंत रोहतांग टनल के अधिशासी अभियंता आरएस राव को भेजा। एसजेवीएन के डीजीएम अरुण धीमान ने भी भू विज्ञानी आरके चौधरी और डीजीएम डिजाइन राकेश सहगल को भेजा। तकनीकी टीम बनाई गई। इसके बाद यह कार्य सफल हो पाया।

सवालःआपको पहले ही पता था कि चट्टानें सख्त हैं। तो राजस्थान से मशीनें पहले ही क्यों नहीं मंगा ली गईं? स्पेयर पार्ट्स भी पहले ही क्यों नहीं मंगा लिए गए?
जवाबःमशीन का जो पार्ट खराब हुआ है, वह ज्यादातर खराब नहीं होता। लेकिन, यहां खराब हो गया। मशीन के कई पार्ट्स साथ लाए गए थे।

सवालःशुरू में बोरिंग में इतना वक्त क्यों लगा?
जवाबःजिस मशीन से बोरिंग की गई, वह मैदानी इलाकों में चलती है। फिर भी यह मशीन यहां लाई गई। और भी कई मशीनें यहां लाई गई थीं।

मजदूरों को पक्की नौकरी, एक-एक लाख का चेक

सतीश तोमर और मणिराम के हौंसले बुलंद हैं। इतना बड़ा हादसा होने के बाद भी सतीश और मणिराम टनल में काम करना नहीं छोडेंगे। सतीश ने शायराना अंदाज में बोला - भूख से बड़ा कोई दुख नहीं और गरीबी से बड़ा कोई श्राप नहीं...। भगवान ने मजदूर बनाया है, काम तो करना ही पड़ेगा।

मजदूरों की बहादुरी को देखकर प्रशासन इन्हें मास्टर ट्रेनर बनाने की प्लानिंग भी कर रहा है। कंपनी ने भी सतीश और मणिराम को पक्के कर्मचारी बनाने का ऐलान किया है जबकि उन्हें एक-एक लाख रुपये का चेक भी दिया।

बोले सीएम- हिम्मत -ए-मर्दा...मददे खुदा
पुलिस अधीक्षक बिलासपुर बलवीर ठाकुर के मुताबिक मजदूरों को जब सुरक्षित बाहर निकाला गया, तो उनकी बात मुख्यमंत्री से करवाई। मुख्यमंत्री ने मजदूरों से शायराना अंदाज में हिम्मते -ए-मर्दा...मददे खुदा कहकर उनके हौसले को और बढ़ाया।

दोनों का स्वास्थ्य बेहतर, आज हो जाएगी छुट्टी
सुरंग से बाहर निकलने के बाद क्षेत्रीय अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती मजदूर तंदुरुस्त हैं। बुधवार को उनको अस्पताल से छुट्टी दे दी जाएगी। चिकित्सकों के मुताबिक मजदूरों के सभी टेस्ट कर लिए गए हैं। अब उनका स्वास्थ्य बिलकुल ठीक है। बुधवार सुबह तक उन्हें घर भेजा जाएगा।
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घटनास्थल पर मेरे जाने की नहीं थी जरूरत: राणा

वहीं, हिमाचल प्रदेश आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के उपाध्यक्ष राजेंद्र राणा पिछले दस दिन तक बिलासपुर के टीहरा में चले अभियान में घटनास्थल पर नहीं गए। उन्होंने सफाई दी कि उनके जाने की कोई जरूरत ही नहीं थी। स्पॉट पर नहीं जाने पर सवाल उठने पर राणा ने कहा कि ऐसे मौकों पर भीड़ की जरूरत नहीं होती बल्कि विशेषज्ञों की जरूरत होती है।

सीएम-राजस्व मंत्री खुद मौके पर जा चुके थे। सीएम प्राधिकरण के अध्यक्ष और कौल सिंह को-चेयरमैन हैं। राणा ने कहा कि वह फोन पर मानीटरिंग कर रहे थे। रोजाना जिला प्रशासन से संपर्क में थे।
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