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20 साल से श्मशान घाट पर हिंदुओं का अंतिम संस्कार करा रहे अली

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भारत-पाक सीमा के निकट कारगिल क्षेत्र के छितकान गांव के मूल निवासी अली हुसैन की मदद से ही संजौली के श्मशान घाट में शवों की कपाल क्रिया होती है। 75 वर्षीय अली हुसैन पिछले लगभग दो दशकों से शिमला में इस सेवा से जुड़े हैं। वे सनातन धर्म सभा शिमला के सदस्य भी हैं। अली यहां लकड़ियां देने से लेकर महाब्राह्मण द्वारा संपन्न कराई जाने वाली कपाल क्रिया में सहायता करते हैं।
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अली हुसैन का सबसे बड़ा कर्म है शव के पूरी तरह जल न जाने तक चिता के आसपास ही सेवारत रहना। हुसैन सवेरे 10 बजे ही संजौली स्थित श्मशानघाट पहुंच जाते हैं। अली के मुताबिक कुछ साल पहले तक कश्मीर से आए कई मुस्लिम परिवार इस काम से जुडे़ थे। मुस्लिम लोग यहां लकड़ी ढोने से लेकर बड़े-बडे़ ठेले फाड़ने तक के काम यहां करते आए हैं। सनातन धर्म सभा से अली को छह-सात हजार रुपये मासिक मिलते हैं।
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लावारिस शवों को खुद देते हैं मुखाग्नि

संजौली श्मशानघाट में कई लावारिस शव भी पहुंचते हैं। उनका दाह-संस्कार भी अली करते हैं। अगर लावारिस, गरीब और असहाय व्यक्ति का शव यहां आता है तो वे मुफ्त में लकड़ी देते हैं। अन्य लोगों को सनातन धर्म सभा की ओर से निर्धारित कीमत पर लकड़ी दी जाती है।

इंसान की सेवा को मानते हैं परम कर्तव्य- अली ने बताया कि वे पक्के मुसलमान हैं और सभी मस्जिदों में जाते हैं। वे बहुत पढ़े-लिखे तो नहीं लेकिन इंसान की सेवा को ही अपने जीवन का परम कर्तव्य मानते हैं। वे अपने इस काम से बहुत संतुष्ट हैं।

आज तक किसी ने भी उन्हें इस काम से नहीं रोका। वे मिस्त्री का काम भी करते हैं। यहां शिव मंदिर के पास बावड़ी, श्मशानघाट की दीवारें उन्होंने ही बनाई हैं। कारगिल में जहां युद्ध हुआ वहां से उनका घर मात्र 50 किमी दूर है।
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