हमीरपुर संसदीय क्षेत्र की 17 विधानसभा सीटों में से इस बार भाजपा के पाले में दस सीटें हैं जो पिछले विधानसभा चुनाव में नौ थीं और कांग्रेस के पाले में छह सीटें हैं जो पिछली बार सात थीं। पिछली बार की तरह अबकी बार भी एक निर्दलीय प्रत्याशी हैं।
इससे एक बात साफ है कि बेशक हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में इस बार कांग्रेस की एक सीट घट गई हो और भाजपा की एक बढ़ गई हो, बावजूद इसके धूमल के गृह जिले हमीरपुर की पांच विधानसभा सीटों में कांग्रेस की सीटें एक से बढ़कर तीन हो गई हैं और भाजपा की चार से घटकर दो रह गई हैं।
मुख्यमंत्री का चेहरा धूमल तक चुनाव हार गए। कांग्रेस ऊना और बिलासपुर जिलों में पीछे है। ऊना जिले से अग्निहोत्री को नेता प्रतिपक्ष बनाने के पीछे एक कारण यह भी है।
चार बार के विधायक मुकेश बतौर मंत्री हमीरपुर जिले के प्रभारी भी रह चुके हैं। यही नहीं, मुकेश दो दशक से अपनी सीट से कांग्रेस को हर बार बढ़त दिला रहे हैं, जबकि इस संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस इस बार बेहद मजबूत दिखी है।
इससे कांग्रेस को धूमल परिवार को घेरने का मौका मिल गया है। धूमल के बाद उनके बेटे अनुराग ठाकुर को घेरना कांग्रेस इसलिए भी आसान मान रही है कि भाजपा की आंतरिक धड़ेबाजी का भी उसे लाभ मिल सकता है।
भाजपा के इस युवा नेता को आगे बढ़ने से रोकने के लिए कांग्रेस को एक मौका नजर आ रहा है। धूमल परिवार पहले से ही हिमाचल कांग्रेस के सबसे बडेे़ नेता वीरभद्र सिंह के निशाने पर लगातार रह चुका है।
हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस विधायक दल के नेता मुकेश अग्निहोत्री, कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सुखविंद्र सिंह सुक्खू के अलावा भाजपा के मुख्यमंत्री पद के दावेदार धूमल को हराने वाले राजेंद्र राणा पर भी इसके लिए बड़ी जिम्मेवारी रहेगी। राणा वर्ष 2014 के आम चुनाव में बतौर कांग्रेस प्रत्याशी भाजपा उम्मीदवार अनुराग ठाकुर को कड़ी टक्कर दे चुके हैं।