वहीं, लवलीना बोरगोहन विश्व चैंपियनशिप में दो कांस्य और एशियाई चैंपियनशिप में एक बार कांस्य पदक अपने नाम कर चुकी हैं। लवलीना की उम्र भले ही 23 साल है, लेकिन उनके इरादे साफ हैं। असम के एक छोटे से गांव से उन्होंने टोक्यो ओलंपकि तक का सफर तय किया है। यहां आपको बताते चलें कि लवलीना असम के गोलाघाट जिले के सरूपथर विधानसबा के छोटे से गांव बरोमुखिया की रहने वाली हैं। लेकिन क्या फर्क पड़ता है कि वे गांव से आती हैं या किसी बड़े शहर से, क्योंकि उनका इरादा तो साफ है कि वे देश के लिए मेडल लाना चाहती हैं और देश का गर्व से सीना चौड़ा करना चाहती हैं।
इससे पहले देश को उस समय गर्व महसूस हुआ, जब मीरा बाई चानू ने 49 किलोग्राम वर्ग में सिल्वर मेडल जीता। बात यहीं खत्म नहीं होती, बल्कि यहां से शुरू होती है। मीराबाई चानू टोक्यो ओलंपिक में रजत पदक जीतने वाली देश की पहली महिला और एकमात्र वेटलिफ्टर हैं। लेकिन यहां ये समझना जरूरी है कि उन्होंने इस पदक को पाने के लिए कितनी मेनहत की। उन्होंने बता दिया कि अगर मेहनत सच्ची है तो फल मीठा जरूर होगा।
मीरबाई ने कड़ी मेहनत की, अपने खानपान पर विशेष ध्यान दिया और काफी ज्यादा और कठिन वर्कआउट किया। मीराबाई चानू ने मीडिया से बातचीत के दौरान बताया कि उन्होंने अपना वजन बढ़ने के डर की वजह से टोक्यों ओलंपिक में दो दिनों तक कुछ भी नहीं खाया। उन्होंने ये भी कहा कि ये बहुत मुश्किल भरा रहा। हमें इस श्रेणी में वजन बनाए रखने के लिए अपनी डाइट पर सख्ती से कंट्रोल की जरूरत थी। इसलिए मैं जंक फूड नहीं खा सकती थीं।
वेटलिफ्टर मीराबाई चानू और बॉक्सर लवलीना बोरगोहेन ने टोक्यो ओलंपिक में ही नहीं, बल्कि भारत का नाम विश्व पटल पर गर्व से ऊंचा कर दिया है। साथ ही उन्होंने तिरंगे की शान भी बढ़ाई है। हर भारतीय को दोनों खिलाड़ियों पर गर्व है और अब इंतजार है कि मीराबाई चानू की तरह ही लवलीना भी अपना मेडल प्राप्त करें, जो वे पहले ही पक्का कर चुकी हैं।