फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Ayodhya Ram Mandir: रामराज्य के असली मायने क्या हैं?

Wed, 17 Jan 2024 08:08 PM IST
अमर शर्मा रवि पाराशर

सार

‘रामराज्य’ शब्द युग्म भी बच्चा-बच्चा जानता है, लेकिन इसके सही मायने क्या हैं यानी रामराज्य की आदर्श व्यवस्थाएं क्या थीं, रामराज्य का मतलब क्या, कैसा राज्य, यह चर्चा का गहन-गंभीर विषय कम ही बनता है। एक लाइन में कहें, तो रामराज्य से सब यही अर्थ निकालते हैं कि राजा राम के राज में सभी लोग सुखी थे यानी कोई दुखी नहीं था। ये सही है, लेकिन ब्रह्मांड की सर्वाधिक जीवंत संज्ञा राम का राज्य व्यवस्था को लेकर पूरा कॉन्सेप्ट क्या था, इसे लेकर आम लोगों और लोकतांत्रिक भारत गणराज्य में राष्ट्र-राज्य का शासन चलाने वालों में जागरूकता जरूर आनी चाहिए। ‘शिक्षा में रामत्व’ या कहें ‘रामत्व में शिक्षा’ अभियान में इस बात की बहुत जरूरत है कि रामराज्य का पूरा कॉन्सेप्ट प्राइमरी से लेकर हायर स्टडीज तक विभिन्न स्तरों पर नागरिक शास्त्र (सिविक्स), समाज शात्र (सोशियोलॉजी) और सामान्य ज्ञान (जनरल स्टडीज) के पाठ्यक्रमों में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। 
विज्ञापन
रवि पाराशर का आलेख - फोटो : Amar Ujala
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

- रवि पाराशर
विज्ञापन

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्क्रिप्ट राइटर और साहित्यकार हैं। प्रिंट और टीवी न्यूज चैनलों में अहम पदों पर रहे हैं। कई विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर हैं।)

पुरातन काल से आज तक भगवान राम की पूरी कथा भारत और दुनिया भर में रह रहा हर भारत वंशी जानता है। अब अयोध्या में भव्य-दिव्य राम मंदिर बन जाने के बाद तो राम कथा युगों-युगों तक अजर-अमर रहनी ही है। लेकिन ज्यादातर लोगों के मन-मष्तिष्क में राम कथा का धार्मिक और आध्यत्मिक पक्ष ही ज्यादा रचा-बसा है। बड़ों की हर आज्ञा का पालन करना, निर्बल, असहाय और वंचित लोगों की मदद करना, उनसे मित्रता करना, हर हाल में उसे निभाना, सामाजिक समरसता कायम करना, हर परिस्थिति में धैर्य बनाए रखना, पाप और पापी का विनाश करना, आदर्श बेटा, आदर्श पति, आदर्श भाई, आदर्श नागरिक, आदर्श राजा जैसे राम के मर्यादित जीवन मूल्यों की ही चर्चा आम तौर पर होती है। 
विज्ञापन


‘रामराज्य’ शब्द युग्म भी बच्चा-बच्चा जानता है, लेकिन इसके सही मायने क्या हैं यानी रामराज्य की आदर्श व्यवस्थाएं क्या थीं, रामराज्य का मतलब क्या, कैसा राज्य, यह चर्चा का गहन-गंभीर विषय कम ही बनता है। एक लाइन में कहें, तो रामराज्य से सब यही अर्थ निकालते हैं कि राजा राम के राज में सभी लोग सुखी थे यानी कोई दुखी नहीं था। ये सही है, लेकिन ब्रह्मांड की सर्वाधिक जीवंत संज्ञा राम का राज्य व्यवस्था को लेकर पूरा कॉन्सेप्ट क्या था, इसे लेकर आम लोगों और लोकतांत्रिक भारत गणराज्य में राष्ट्र-राज्य का शासन चलाने वालों में जागरूकता जरूर आनी चाहिए। ‘शिक्षा में रामत्व’ या कहें ‘रामत्व में शिक्षा’ अभियान में इस बात की बहुत जरूरत है कि रामराज्य का पूरा कॉन्सेप्ट प्राइमरी से लेकर हायर स्टडीज तक विभिन्न स्तरों पर नागरिक शास्त्र (सिविक्स), समाज शात्र (सोशियोलॉजी) और सामान्य ज्ञान (जनरल स्टडीज) के पाठ्यक्रमों में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। 

वाल्मीकि के रामायण महाग्रंथ में 100वां सर्ग रामराज्य के कॉन्सेप्ट पर ही केंद्रित है। पिता की आज्ञा मान कर राम, सीता और लक्ष्मण समेत वनवास के लिए चले जाते हैं। ननिहाल में रह रहे भरत और शत्रुघ्न को बिना कुछ बताए आनन-फानन में अयोध्या बुलाया जाता है। भरत का राजतिलक होना है। अयोध्या पहुंचने पर जब भरत को हालात की जानकारी मिलती है, तो वे मां कैकेयी को बहुत कोसते हैं। राजतिलक न करा कर राजपरिवार और सेना समेत राम को अयोध्या वापस लाने के इरादे से उनके पास जंगल में पहुंचते हैं। आपसी अभिवादन के बाद राम, भरत से अयोध्या के शासन को लेकर कई सवाल पूछते हैं। असल में उन सवालों में ही रामराज्य का पूरा कॉन्सेप्ट समाहित है।

रामायण के 100वें सर्ग की शुरुआत भरत से राम के प्रश्नों से होती है। पहले राम पिता दशरथ और अयोध्या के बारे में जानकारी मांगते हैं। फिर नौंवे श्लोक से भरत के जरिये लोक को रामराज्य का संदेश देना शुरू करते हैं। वे पूछते हैं कि क्या तुम सदा धर्म में तत्पर रहनेवाले, विद्वान्, ब्रह्मवेत्ता और इक्ष्वाकु कुल के आचार्य महातेजस्वी वसिष्ठजी की यथावत पूजा करते हो? संदेश साफ है कि शिक्षा देने वाला गुरु सर्वप्रथम पूज्य है। फिर वे रोजमर्रा की सनातन परंपरा में होने वाले कर्मकांड समय पर हो रहे हैं या नहीं, इस बारे में पूछते हैं।

वे भरत से पूछते हैं कि क्या तुम देवताओं, पितरों, भृत्यों, गुरुजनों, पिता के समान आदरणीय वृद्धों, वैद्यों और ब्राह्मणों (कर्म से) का सम्मान करते हो? यानी रामराज्य में ऐसा होना चाहिए। राम पूछते हैं, “क्या मंत्ररहित बाणों, मंत्रसहित अस्त्रों का इस्तेमाल जानने वालों और अर्थशास्त्र के अच्छे जानकारों का अयोध्या में सम्मान किया जा रहा है?” यानी अच्छे सुरक्षा इस्तेमाल और अच्छी इकोनॉमी राम की प्राथमिकता है। राम भरत से पूछते हैं, “क्या उन्होंने खुद जैसे शूरवीर, शास्त्रों की जानकारी रखने वाले, इंद्रियों को काबू में रखने वाले और बाहरी हलचलों से ही मन की बात समझ लेने वाले योग्य व्यक्तियों को ही मंत्री बनाया है?” 

भगवान राम और उनके भाई भरत (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया
जरा सोचिए कि हजारों हजार साल पहले की राज व्यवस्था को लेकर ब्रह्मांड के महा विराट नायक राम की दृष्टि कितनी पैनी थी। भले ही अब राजशाही नहीं रही, भारत में रानजैनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था है और करीब-करीब पूरी दुनिया ही लोकतंत्र की हिमायती है। ऐसे में रामराज्य न केवल भारत के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए आदर्श राजनैतिक व्यवस्था है और जरूरी है। राम, भरत से कहते हैं, “अच्छे सहालकार ही राजाओं की जीत की मूल वजह होते हैं। अच्छी सलाह भी तभी कामयाब होती है, जब नीति के जानकार मंत्री उसे पूरी तरह गुप्त रखें। कोई भी गुप्त सलाह दो से चार कानों तक ही गोपनीय रहती है। छठवें व्यक्ति को पता लगते ही सलाह गुप्त नहीं रहती।” राम पूछते हैं, “तुम किसी गूढ़ विषय पर अकेले ही तो विचार नहीं करते? या बहुत से लोगों से तो सलाह-मशविरा नहीं करते? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम्हारी तय की हुई गुप्त मंत्रणा की भनक दुश्मन राज्य तक पहुंच जाती हो?”

राम पूछते हैं, “कम साधनों में ज्यादा फायदा देने वाली योजनाओं पर क्या तुम जल्दी काम शुरू कर देते हो, देर तो नहीं करते? दूसरे राजाओं को तुम्हारी योजनाओं का पता उनके पूरी होने से पहले ही तो नहीं चल जाता? तुम्हारे तय किए गए विचार अगर मंत्री भी गुप्त रखें, तो क्या तर्क और युक्तियों से दूसरे लोग उनका पता तो नहीं लगा लेते? क्या तुम्हें और तुम्हारे मंत्रियों को दूसरों के गुप्त विचारों का पता चल जाता है? क्या तुम हजारों मूर्खों के बदले एक ज्ञानी को ही अपने पास रखने की इच्छा रखते हो? अगर राजा हजार या 10 हजार मूर्खों को अपने पास रख ले, तो भी उनसे मौका पड़ने पर कोई मदद नहीं मिलती। एक मंत्री भी मेधावी, शूरवीर, चतुर और नीति का जानकार हो, तो वह राजा या राजकुमार को बहुत बड़ी संपत्ति की हासिल करा सकता है। जो रिश्वत न लेते हों, ऐसे अमात्यों को ही क्या तुम अच्छे कामों के लिए तैनात करते हो?” 

राम आगे पूछते हैं, “ज्यादा कड़ी सजा देने से कहीं तुम्हारी प्रजा मंत्रियों का अपमान तो नहीं करती? कहीं ज्यादा टैक्स लेने से तुम्हारी प्रजा तुम्हारा अपमान तो नहीं करती? कोई तुम्हारे कर्मचारियों को अपने पक्ष में बरगलाता तो नहीं है? ऐसा व्यक्ति राजा को मार डालता है। तुमने हमेशा संतुष्ट रहने वाले, शूरवीर, धैर्यवान, बुद्धिमान, युद्ध कुशल व्यक्ति को ही सेनापति बनाया है क्या? क्या तुम अपने सेनापति का वक्त-वक्त पर सम्मान करते हो? क्या तुम सैनिकों को अच्छा वेतन समय पर देते हो? इसमें देरी करने से बड़ा अनर्थ हो सकता है। क्या तुम्हारे मंत्री औऱ कर्मचारी तुम्हारे लिए जान कुर्बान कर सकते हैं? क्या तुम्हारा राजदूत अपने ही देश का निवासी, विद्वान, प्रतिभाशाली और जैसा कहा जाए, वैसा ही संदेश दूसरों के सामने कहने वाला व्यक्ति है? ” 

राम भरत से पूछते हैं, “क्या तुम शत्रु पक्ष के 18 और अपने 15 तीर्थों (राज व्यवस्था से जुड़े विभागों) की देखभाल या पड़ताल तीन-तीन अज्ञात गुप्तचरों की मदद से करते रहते हो? जिन शत्रुओं को तुमने राज्य से निकाल दिया है, वे फिर लौटकर आते हैं, तो क्या तुम उन्हें कमजोर समझकर उनकी उपेक्षा तो नहीं करते? क्या तुम कृषि और गोरक्षा से रोजी-रोटी चलाने वालों का ध्यान रखते हो? क्योंकि कृषि और व्यापार वगैरह में लगे रहने पर ही यह लोक सुखी और तरक्की करने वाला होता है। राजा को अपने राज्य में रहने वाले सभी लोगों का धर्म के मुताबिक पालन करना चाहिए। क्या तुम रोज दोपहर से पहले वस्त्राभूषणों से विभूषित हो कर मुख्य सड़क पर जाकर नगरवासियों को दर्शन देते हो? ”
राम पूछते हैं, “क्या तुम्हारे सभी किले धन-धान्य, अस्त्र-शस्त्र, पानी,  मशीनों, शिल्पियों और धनुर्धर सैनिकों से भरे-पूरे रहते हैं? क्या तुम्हारी आमदनी ज्यादा और खर्च बहुत कम है? तुम्हारे खजाने का धन गलत लोगों के हाथ में तो नहीं चला जाता? क्या तुम्हारे राज्य में बिना अच्छी जांच-पड़ताल के ही सिर्फ आरोपों के आधार पर ही सिर्फ पैसा कमाने के इरादे से ही तो किसी पर जुर्माना नहीं लगा दिया जाता? जो चोरी के आरोप में पकड़ा गया हो, जिसे किसी ने चोरी करते देखा हो, पूछताछ से भी जिसके चोर होने का प्रमाण मिल गया हो और जिसके खिलाफ (चोरी का माल बरामद होना वगैरह) और भी बहुत से सुबूत हों, ऐसे चोर को तुम्हारे राज्य में पैसे के लालच से छोड़ तो नहीं दिया जाता है? धनी और गरीब में विवाद छिड़ा हो और गरीब राज्य के न्यायालय में निर्णय के लिए आया हो, तो तुम्हारे मंत्री धन आदि के लोभ को छोड़कर उस मामले पर विचार करते हैं न?” 

भगवान राम (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया
राम कहते हैं कि निरपराध होने पर भी जिन्हें मिथ्या दोष लगाकर दंड दिया जाता है, उन मनुष्यों की आंखों से जो आंसू गिरते हैं, वे पक्षपातपूर्ण शासन करने वाले राजा के पुत्र और पशुओं का नाश कर डालते हैं। वे भरत से पूछते हैं, “क्या तुम बुजुर्गों, बालकों और प्रधान वैद्यों का दिल से, मधुर वचन और धन-दान से सम्मान करते हो? तुम अर्थ से धर्म को या धर्म से अर्थ को नुकसान तो नहीं पहुंचाते?  नास्तिकता, झूठ बोलना, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानी पुरुषों का संग न करना, आलस्य, नेत्र वगैरह पांचों इंद्रियों के वशीभूत होना, राजकार्यों के विषय में अकेले ही विचार करना, प्रयोजन को न समझने वाले विपरीतदर्शी मूर्ख से सलाह लेना, तय किए हुए कामों को जल्द शुरू न करना, गुप्त मंत्रणा को सुरक्षित न रखकर प्रकट कर देना, मांगलिक कामों का अनुष्ठान न करना और सब शत्रुओं पर एक साथ चढ़ाई कर देना, ये राजा के 14 दोष हैं। तुम इन दोषों का सदा परित्याग करते हो न? ”

वे कहते हैं, “ये 10 दोष राजाओं में नहीं होने चाहिए- आखेट, जुआ, दिन में सोना, दूसरों की बुराई करना, स्त्री में आसक्ति होना, मद्यपान, नाचना, गाना, बाजा बजाना और बेकार घूमना। खेती की उन्नति करना, व्यापार बढ़ाना, दुर्ग बनवाना, पुल बनवाना, जंगल से हाथी पकड़कर मंगवाना, खानों पर हक हासिल करना, अधीन राजाओं से टैक्स लेना और निर्जन प्रदेश को आबाद करना, ये राजा के आठ गुण हैं। शत्रु राजाओं के सेवकों में से जिनको वेतन न मिला हो, जो अपमानित किए गए हों, जो अपने मालिक के किसी बर्ताव से गुस्से में हों औऱ जिन्हें डराया गया हो, ऐसे लोगों को मनचाही वस्तु देकर अपने पक्ष में कर लेना राजा की नीति मानी गई है।” 

वाल्मीकि रामायण के अनुसार राम अपने भाई भरत से और भी बहुत कुछ कहते हैं, जिससे अच्छा राजकाज करने में मदद मिलती है। इनमें से बहुत सी सलाहें तब तक शासन के लिए जरूरी थीं। आज उनकी जरूरत नहीं है। लेकिन राम के मन में आदर्श राज-व्यवस्था का पूरा खाका था और राजा बनने पर उन्होंने इसे शत प्रतिशत लागू भी किया। हालांकि यह भी सच है कि राम के उपदेश सुन कर भरत ने ही रामराज्य की नींव डाल दी थी। 

इसी तरह बहुत बाद में तुलसीदास की रामचरित मानस में भी जब राम वनवास पूरा कर अयोध्या लौट कर आते हैं, तब भी राम और भरत का संवाद होता है। हनुमान राम से कहते हैं कि भरत आपसे कुछ पूछना चाहते हैं, लेकिन उन्हें कुछ संकोच हो रहा है। राम के कहने पर भरत उनसे पूछते हैं कि संतों और असंतों के क्या लक्षण होते हैं? इस पर राम कहते हैं, “संतों के लक्षण असंख्य हैं। संतों और असंतों की करनी ऐसी है, जैसे कुल्हाड़ी और चंदन का आचरण होता है। कुल्हाड़ी चंदन को काटती है, क्योंकि उसका स्वभाव या काम ही पेड़ काटना है, लेकिन चंदन अपने स्वभाव की वजह से अपना गुण देकर कुल्हाड़ी को सुगंध से भर देता है। इसी गुण की वजह से चंदन देवताओं के सिरों पर चढ़ता है और जगत में प्रिय हो रहा है और कुल्हाड़ी के मुंह को यह दंड मिलता है कि उसे आग में जलाकर फिर घन से पीटा जाता है।” 
विज्ञापन

भगवान राम (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Amar Ujala
राम कहते हैं, “संत विषयों में लिप्त नहीं होते, शील और सद्गुणों की खान होते हैं। उन्हें पराया दुख देखकर दुख और सुख देखकर सुख होता है। वे समता रखते हैं, उनके मन में कोई उनका दुश्मन नहीं है। वे मद से रहित और वैराग्यवान होते हैं। लोभ, क्रोध, हर्ष और भय का त्याग किए हुए रहते हैं। उनका चित्त बड़ा कोमल होता है। वे दीनों पर दया करते हैं और मन, वचन और कर्म से मेरी निष्कपट भक्ति करते हैं। सबको सम्मान देते हैं,  लेकिन खुद मानरहित होते हैं। उनकी कोई कामना नहीं होती। वे शांति, वैराग्य, विनय और प्रसन्नता के घर होते हैं। उनमें शीलता, सरलता, सबके प्रति मित्र भाव और ब्राह्मण के चरणों में प्रीति होती है। ये सब लक्षण जिसके हृदय में बसते हों, उसे सदा सच्चा संत समझना चाहिए। जिनके लिए निंदा और स्तुति, दोनों समान हैं, वही संत हैं।”  

राम, भरत को बताते हैं, “कभी भूल कर भी असंतों की संगति नहीं करनी चाहिए। उनका संग सदा दुख देने वाला होता है। दुष्टों के हृदय में बहुत ज्यादा संताप रहता है। वे पराई संपत्ति देख कर हमेशा जलते रहते हैं। वे जहां कहीं दूसरे की निंदा सुन पाते हैं, वहां ऐसे खुश होते हैं मानो रास्ते में पड़ा खजाना पा लिया हो। वे काम, क्रोध, मद और लोभ में रहते हैं। निर्दयी, कपटी, कुटिल और पापों के घर होते हैं। वे बिना वजह सब से वैर करते हैं। जो भलाई करता है, उसके साथ बुराई करते हैं। वे सभी बातों में झूठ ही बोलते हैं। वे किसी को संकट में देख कर ऐसे सुखी होते हैं मानो दुनिया भर के राजा हो गए हों। वे माता, पिता, गुरु और ब्राह्मण किसी को नहीं मानते। खुद तो नष्ट हुए ही रहते हैं, दूसरों को भी नष्ट करते हैं। मोहवश दूसरों से द्रोह करते हैं। उन्हें न संतों का संग अच्छा लगता है, न भगवान की कथा ही अच्छी लगती है।“
 
राम कहते हैं, “दूसरों की भलाई के जैसा कोई धर्म नहीं है और दूसरों को दुख पहुंचाने जैसी कोई नीचता नहीं है। मनुष्य का शरीर धारण कर जो लोग दूसरों को दुख पहुंचाते हैं, उनको जन्म-मृत्यु के महान संकट सहने पड़ते हैं। मनुष्य मोहवश स्वार्थी होकर अनेक पाप करते हैं, इसी से उनका परलोक नष्ट हो जाता है।” इस तरह हम देखते हैं कि राम, धर्म और अध्यात्म के साथ ही सामाजिक संस्कारों, राजनैतिक व्यस्थाओं के लिए आदर्श संदेश देते हैं। 

लंबे संघर्ष के बाद अब अयोध्यापुरी में राम का भव्य मंदिर बन गया है, तो उम्मीद करनी चाहिए कि राम के संदेश दिग-दिगंत में गूंजेंगे और सनातन संस्कृति का डंका पूरे वेग से पूरी दुनिया में आन-बान-शान से बजेगा। शिक्षा में रामत्व बेहद आवश्यक है। आज के दौर की दुनिया को इसकी बहुत जरूरत है। 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें