श्रीराम सबके हैं, यह बात भारतवर्ष ही नहीं, पूरा विश्व समझने लगा है। श्रीराम ने जगत के प्राणियों को अपना माना तो उनकी समस्याओं का निवारण और उद्धार भी किया। श्रीराम के वनगमन में केवट का प्रसंग बहुत कुछ कहता है। भोईवंश से संबंध रखने वाले केवट मल्लाह हैं और नैया खेने का काम करते हैं।
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केवट श्रीराम की अवज्ञा भी करते हैं तो भी वे मुस्काते हैं। केवट मनमानी पर अटल हैं, तो प्रभु करने देते हैं और अंत में उन्हें आशीर्वाद भी दे जाते हैं। कारण था-केवट का भक्ति भाव। प्रभु श्रीराम को गंगा पार जाना था तो कहा-भाई, नैया यहां लाओ, गंगा पार जाना है। केवट ने आज्ञा का पालन नहीं किया, बल्कि सहज भाव में बोले-मैंने आपका भेद जान लिया।
सब कहते हैं, आपके चरणों की रज मनुष्य बना देने वाली है, जिसके छूते ही पत्थर की शिला सुंदर स्त्री बन गई। मेरी नैया तो काठ की है। श्री रामचरितमानस के अयोध्याकांड में लिखा है-
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मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥
चरन कमल रज कहुं सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥
केवट उसी सरलता से आगे कहते हैं-हे नाथ! मैं चरण कमल धोकर आपको नाव पर चढ़ा लूंगा। कुछ उतराई नहीं चाहता। लक्ष्मण जी भले ही तीर मारें, पर जब तक पैरों को पखार न लूं, तब तक हे कृपालु! मैं पार नहीं उतारूंगा। केवट के लिए भगवान की सेवा परमधाम है। इसीलिए सेवा का यह अवसर गंवाना नहीं चाहते, तो काठ की नैया की बात कह दी।
सर्वज्ञानी प्रभु मुस्काए, बोले-भाई, वही कर जिससे तेरी नाव न जाए, जल्दी जल लाओ और चरण धो लो। केवट की हठ पूरी हुई, प्रफुल्लित मन से कठौते में जल लाए। भगवान के चरणकमल धोए। एक मल्लाह तीनों लोकों के पालनहार की नैया पार लगा रहे थे। यही तो केवट के जीवन का परमानंद है। गंगा पार हुई तो तट पर उतरते ही केवट प्रभु के समक्ष दंडवत हो गए।
श्रीराम को संकोच हुआ तो जानकी जी ने तुरंत अंगूठी उतारकर दे दी। प्रभु केवट से बोले-नाव की उतराई लो। तब व्याकुल हुए केवट ने चरण पकड़ लिए और बोले-हे नाथ, आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुख और दरिद्रता की आग आज बुझ गई। विधाता ने आज भरपूर पारिश्रमिक दे दिया। हे दीनदयाल, आपकी कृपा से अब मुझे कुछ नहीं चाहिए, तब भगवान श्रीराम ने केवट को निर्मल भक्ति का वरदान देकर विदा किया।
भेदभाव की चर्चा हो तो पढ़ें रामायण : केवट जो एक मल्लाह है, वह अयोध्या के राजा का सान्निध्य और सेवा चाहता है। श्रीराम उसे वह सब देते हैं, जो वह चाहता है। उसके श्रम का पूरा सम्मान करते हैं। श्रीराम ने सामाजिक स्थिति के बजाय उसके भक्ति भाव, सेवा भाव, श्रद्धा भाव को प्राथमिकता दी। श्रीराम ने समाज में उनके स्थान को और व्यापकता व प्रतिष्ठा दी।
यही रामराज्य की अवधारणाओं में भी शाश्वत था और है। आज केवट समाज या किसी भी वर्ग को लेकर यदि कोई भेदभाव की चर्चा करता है तो उन्हें श्री रामायण का बारंबार अध्ययन करना चाहिए। इसीलिए राम मेरे हैं-आपके हैं-राष्ट्र के और विश्व के भी। राम सर्वत्र हैं, सर्वप्रिय हैं, सार्वभौमिक हैं। राम सब के हैं। (राज चावला, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)