कुछ लोग कामराज प्लान को इंदिरा के चतुर दिमाग की दूरगामी सोच की उपज भी मानते हैं।
क्या इंदिरा की ही देन था सिंडिकेट?
जवाहरलाल नेहरू के पुराने दोस्त मोरारजी देसाई और के. कामराज ने सिंडिकेट की नींव रखी। 1963 में कामरान प्लान बना। यह एक ऐसी रणनीति थी जिससे लोगों के साथ कांग्रेस के संपर्क को पुन: स्थापित करने की नियत से बनाया गया था। ऐसा माना जा रहा था कि कांग्रेस में जो लोग ऊंचे पदों पर थे जनता से उनका संपर्क खत्म हो गया था। इसी को लेकर कामराज योजना बनी जो बाद में सिंडिकेट के नाम से इंदिरा के लिए चुनौती बनी। कामराज योजना के तहत वरिष्ठ कांग्रेसियों को अपने पदों को त्यागकर पार्टी के काम में जुट जाना था। कुछ लोग कामराज प्लान को इंदिरा के चतुर दिमाग की दूरगामी सोच की उपज भी मानते हैं। यह भी कहा जाता है कि नेहरू के आखिरी दिनों में राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को ठिकाने लगाने के लिए इंदिरा ने ही इस प्लान को अंजाम दिया था। हालांकि इंदिरा गांधी इस बात को नकारती रहीं थीं।
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कामराज प्लान के तहत छह कैबिनेट मंत्रियों और छह सबसे ताकतवर मुख्यमंत्रियों ने अपने पदों को त्याग दिया। मोरारजी देसाई, लाल बहादुर शास्त्री, जगजीवन राम, कामराज, बीजू पटनायक और एस.के पाटिल अपने पदों से इस्तीफा देकर पार्टी के लिए काम करने चले गए। हालांकि, लाल बहादुर शास्त्री को फिर से नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया था। इस योजना का नामकरण कुमारस्वामी कामराज के नाम पर हुआ। कामराज तब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थे। 1963 में वे कांग्रेस अध्यक्ष भी बने। कामराज ने कांग्रेस के अनुभवी बुजुर्ग नेताओं के साथ मिलकर एक गुट बनाया जो सिंडिकेट कहलाया। इस तरह कांग्रेस की सत्ता सिंडिकेट के हाथों केंद्रित हो गई थी और नेहरू के मृत्यु के बाद ये ही लोग भाग्यनियंता हो गए। इस सिंडिकेट में क्षेत्रीय वर्चस्व अव्वल था। सिंडिकेट के साथ एन संजीव रेड्डी से लेकर अतुल्य घोष, सिद्धवनहल्ली निजलिंगप्पा और सदाशिव कानोजी पाटिल (एस.के) शामिल थे। ये ही सिंडिकेट 1967 के चुनाव में इंदिरा के खिलाफ था और 1966 के उनके फैसलों को लेकर इंदिरा के खिलाफ आक्रमक भी था।
नोट- तथ्य एवं सूचना सागरिका घोष की किताब 'इंदिरा भारत की सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री' से साभार