Priyanka Gandhi- Rahul Gandhi
प्रियंका के राहुल से आगे निकल जाने का डर!
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस प्रियंका को अगली कतार में रखना तो चाहती है, लेकिन यह भी डर बना रहता है कि वह राहुल गांधी से आगे न निकल जाएं। इधर, प्रियंका को पार्टी संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी दी गई है। यूपी में वह अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा भी रही हैं। बिहार के दरभंगा विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन की फाउंडर लेक्चरर रह चुकीं और वर्तमान में पोस्ट डॉक्टरल फेलो डॉ. चित्रलेखा अंशु कहती हैं कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा से असंतुष्ट हिस्से को नरेंद्र मोदी के समकक्ष एक मजबूत दावेदार की तलाश है और ऐसे में कांग्रेस राहुल को विकल्प के तौर पर पेश करना चाहती है।
डॉ चित्रा कहती हैं कि कांग्रेस को यह भी डर है कि प्रियंका सार्वजनिक मंचों पर लोगों से मुखातिब होती रहीं, तो मैदान मार ले जाएंगीं। कारण कि समर्थक और काफी हद तक कार्यकर्ता भी प्रियंका में उनकी दादी इंदिरा गांधी की छवि तलाशने लगते हैं। लखनऊ के बीबीए केंद्रीय विश्वविद्यालय से लघु शोध कर चुकीं मीडिया फेलो आरती भी उनकी इस बात से इत्तेफाक रखते हुए कहती हैं कि भले ही इंदिरा गांधी की कुशल प्रशासक और आयरन लेडी वाली बात प्रियंका में न हो, लेकिन भावनात्मक तौर पर और अपने भाषणों से वह काफी हद तक प्रभावित तो कर ही देती हैं।
पितृसत्तात्मक सोच का भी असर?
डॉ चित्रलेखा कहती हैं कि शुरू से यही धारणा रही है कि एक परिवार का संचालन, एक कॉरपोरेट संस्थान का संचालन, एक राष्ट्र का संचालन अच्छे से एक पुरुष ही कर सकता है। पार्टी की अध्यक्ष रहते सोनिया गांधी चाहतीं तो 2009 में या 2014 में प्रधानमंत्री बन सकती थीं, लेकिन नहीं बनीं। कारण और भी रहे होंगे, लेकिन उनका महिला होना भी बड़ा फैक्टर रहा होगा। उन्हें विदेशी बता-बता कर विरोधी उन पर हमलावर रहे। यही फैक्टर प्रियंका गांधी के संदर्भ में भी है।
डॉ चित्रा अमेरिकी चुनाव का भी उदाहरण देती हैं। वो कहती हैं कि अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्र ने हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रंप के बीच में से ट्रंप को ही चुना। उनकी नजर में हिलेरी राजनीतिक दृष्टि से ट्रंप से कहीं ज्यादा सशक्त दिखती थीं, बावजूद इसके ट्रंप को पुरुष होने का फायदा मिल गया। राजनीतिक जानकार डॉ अभिषेक श्रीवास्तव मानते हैं कि जितनी मेहनत कांग्रेस ने राहुल गांधी के पीछे की, जितने मौके, जितना बड़ा पद और जितनी बड़ी जिम्मेदारी राहुल को दी गई, उनकी तुलना में आधा भी प्रियंका गांधी को मिला होता तो कांग्रेस की स्थिति बेहतर होती।