अवैध खनन के विरोध में संत ने किया था आत्मदाह
भरतपुर के आदिबद्री धाम और कनकांचल पर्वत क्षेत्र में हो रहे अवैध खनन खनन के विरोध में संत समाज के लोग 20 जुलाई को प्रदर्शन कर रहे थे। पसोपा में आंदोलन स्थल पर संत विजयदास ने खुद को आग लगा ली थी। जिससे वह 80 फीसदी झुलस चुके थे। इलाज के दौरान उन्होंने दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में दम तोड़ दिया था।
जानिए क्या है मामला?
यह पूरा मामला आस्था और नियम-कानूनों का है। ब्रज क्षेत्र के पर्वतों को कृष्णभक्त पवित्र मानते हैं। उनका विरोध माइनिंग को लेकर है, जिसका माइनिंग लाइसेंस गहलोत सरकार में राज्यमंत्री जाहिदा खान के बेटे साजिद खान के पास है। कांग्रेस की सरकार में ही साजिद ने दो खदानों की लीज खरीदी थी। संत समाज इन पहाड़ों को संरक्षित वन क्षेत्र घोषित कर वन विभाग को सौंपने की मांग लंबे समय से कर रहा है।
कृष्णभक्त पवित्र मानते हैं ब्रज क्षेत्र के पहाड़ों को
भगवान कृष्ण ने ही गोवर्धन पूजा करवाई थी और उसके बाद से ब्रज में सभी पर्वतों की पूजा होती है। आदिबद्री और कनकांचल में हिंदुओं की गहरी आस्था है। पौराणिक कहानी है कि भगवान कृष्ण ने नंद बाबा और यशोदा माता को तीर्थ कराने के लिए आदिबद्री में ही सभी तीर्थों को बुलाया था। इसी जगह पर बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री समेत सभी मंदिर बने हैं। ऐसा माना जाता है कि ब्रज पर्वत की यात्रा करने से चार धामों की तीर्थ यात्रा का फल मिलता है।
एक दिसंबर से शुरू होगा बड़ा आंदोलन।
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2009 में हुआ था पहली बार आंदोलन
यह विवाद नया नहीं है। नवंबर 2009 में साधु-संतों और कृष्ण भक्तों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए उस समय की कांग्रेस सरकार ने डीग व कामां तहसील के पर्वतों को संरक्षित वन क्षेत्र घोषित करने की शुरुआत की थी। उस समय कनकांचल और आदिबद्री का कुछ हिस्सा वन क्षेत्र में घोषित होने से रह गया था। इसकी वजह थी कि यह हिस्सा अन्य तहसीलों में पड़ता था। मान मंदिर बरसाना के अध्यक्ष राधाकांत शास्त्री का कहना है कि कनकांचल और आदिबद्री का कुछ हिस्सा महत्वपूर्ण है। इसे अब भी संरक्षित वन में शामिल नहीं किया गया है। हकीकत तो यह है कि पिछले 15 साल से साधु समाज इसी पहाड़ी के लिए संघर्ष कर रहा था।