राजस्थान की डूंगरपुर-बांसवाड़ा लोकसभा सीट पर सियासत ने नाटकीय रूप ले लिया है। कांग्रेस ने इस सीट से अपने उम्मीदवार अरविंद डामोर को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया है।क्योंकि उन्होंने कांग्रेस और भारतीय आदिवासी पार्टी (बीएपी) के बीच गठबंधन होने के एलान के बाद नाम वापस नहीं लिया।
ऐसे में दिलचस्प बात यह है कि निष्कासन के बावजूद अरविंद डामोर कांग्रेस के ही उम्मीदवार रहेंगे।क्योंकि निष्कासन से पहले ही पार्टी डामोर को चुनाव चिह्न दे चुकी थी। पहले यहां से कांग्रेस और भारतीय आदिवासी पार्टी (बीएपी) के उम्मीदवारों ने नामांकन फॉर्म भरे। सोमवार को कांग्रेस ने बीएपी से गठबंधन का एलान कर दिया। लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार अरविंद डामोर अचानक गायब हो गए और उनसे किसी का संपर्क नहीं हो पाया। इस घटनाक्रम के बाद अब बांसवाड़ा सीट पर कांग्रेस भले ही अपने उम्मीदवार का प्रचार न करे, लेकिन उसका प्रत्याशी मैदान में रहेगा। इस वजह से इस सीट पर भाजपा के महेंद्र जीत सिंह मालवीया, बीएपी के राजकुमार रोत और कांग्रेस के अरविंद डामोर के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होगा।
अर्जुन बामनिया को उम्मीदवार बनाने का फैसला
कांग्रेस ने इस सीट पर नामांकन दाखिल करने के आखिरी दिन अर्जुन बामनिया को उम्मीदवार बनाने का फैसला किया था। वहीं, अरविंद डामोर से डमी कैंडिडेट के तौर पर नामांकन जमा करवाया था। बामनिया ने ऐन वक्त पर नामांकन ही दाखिल नहीं किया। इसलिए कांग्रेस ने डामोर को अपना चुनाव चिह्न दे दिया था। इस दौरान कांग्रेस और बीएपी के बीच गठबंधन को लेकर चर्चा चल रही थी, सोमवार सुबह इस पर फैसला होने के बाद कांग्रेस ने गठबंधन का एलान किया। लेकिन फिर डामोर ने नाम वापस नहीं लिया। डामोर के साथ ही पार्टी ने बागीदौरा विधानसभा सीट पर उप चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी कपूर सिंह को भी छह साल के लिए निष्कासित कर दिया। उन्होंने भी नामांकन वापस नहीं लिया। तकनीकी तौर पर ये कांग्रेस के उम्मीदवार रहेंगे।
बीएपी ने दावा किया कि बीजेपी उम्मीदवार महेंद्र जीत सिंह मालवीया कांग्रेस उम्मीदवारों के नामांकन वापस नहीं होने देने का दबाव बना रहे थे। बीएपी प्रवक्ता प्रोफेसर जितेंद्र मीणा ने सोशल मीडिया पर लिखा था, बागीदौरा उपचुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार रविवार रात से गायब थे। बीजेपी उम्मीदवार महेंद्र जीत मालवीया की तरफ से नॉमिनेशन वापस नहीं लेने का दबाव था। अब देखते हैं कांग्रेस कैसे इस चुनौती से निपटेगी। कैसे गठबंधन धर्म निभाएगी।
गठबंधन की घोषणा के कुछ ही घंटे बाद सुर बदले
रविवार को कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा ने बीएपी के साथ दोनों सीटों (बांसवाड़ा और बागीदौरा) पर गठबंधन की घोषणा की थी। रंधावा ने एक्स पर पोस्ट लिखकर दोनों सीटों पर बीएपी को समर्थन देने की घोषणा की तो राजकुमार रोत (बीएपी) ने गठबंधन का स्वागत किया।
कांग्रेस जिलाध्यक्ष रमेश चंद्र पंड्या ने कहा था कि गठबंधन को लेकर हम तक सूचना भी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए मिली। लंबे समय से गठबंधन के प्रयास चल रहे थे। इस बीच नामांकन भरने की भी बात आई और नामांकन भरा। अब फिर गठबंधन का आलाकमान ने फैसला लिया है तो निश्चित रूप से हमें यह मानना ही है। कांग्रेस के कमजोर होने के सवाल पर उन्होंने कहा, कांग्रेस कमजोर हुई है यह हम नहीं मानते। अगर हमारे बड़े नेता प्रजातंत्र के हित में या सिद्धांतों के लिए गठबंधन करते हैं तो सही है।
नामांकन के आखिरी दिन रोत ने मांगा था समर्थन
चार अप्रैल को नामांकन के आखिरी दिन बीएपी के राजकुमार रोत ने गठबंधन की पेशकश की थी। बीएपी और कांग्रेस में गठबंधन को लेकर लंबे समय से बातचीत चल रही थी। आदिवासी इलाके के कई कांग्रेस नेता इसका विरोध कर रहे थे। बीएपी कई और सीटें भी मांग रही थी। इसलिए आखिर तक पेच फंसा रहा। एक बार बातचीत लगभग टूट गई तो कांग्रेस ने उम्मीदवार उतारने की घोषणा कर दी थी। इसके बाद रोत नरम पड़े और फिर गठबंधन की बात चली। आखिर में केवल बांसवाड़ा और बागीदौरा सीटों पर गठबंधन की बात बन गई थी।
बांसवाड़ा सीट से बीजेपी उम्मीदवार बनाए गए महेंद्र जीत सिंह मालवीया की वजह से बागड़ की सियासत बदल गई। मालवीया कांग्रेस में रहते हुए बागीदौरा सीट से लगातार जीत रहे थे। इस बीच उन्होंने बीजेपी ज्वॉइन कर ली। बीजेपी ज्वॉइन करने के साथ इलाके के कई कांग्रेस नेता भी उनके साथ चले गए। इसी काे लेकर अब इलाके के सियासी समीकरण बदल गए हैं। कांग्रेस और बीएपी के साथ मिलने से एक बड़ा वोट बैंक जुड़ जाएगा। बीजेपी विरोधी वोट एक जगह हो जाएगा। बीजेपी का हित इसमें था कि गठबंधन न हो, लेकिन कांग्रेस ने गठबंधन की घोषणा कर दी।