राजधानी जयपुर के सरकारी दफ्तर डीओआईटी में एक के बाद एक कई साजिशें सामने आ रही हैं। यहां अलमारी में मिले खजाने के मामले में एसीबी ने जिस पत्र पर सरकार से प्रॉसीक्यूशन सेंक्शन की अनुमति मांगी वह पत्र भी भ्रष्टाचार की एक और अलमारी में दबा दिया गया था। खास बात यह है कि इस विभाग के एसीएस अखिल अरोड़ा ही हैं।
एसीबी ने डीओआईटी ( डिपार्टमेंट ऑफ इंफॉर्मेशन एंड टेक्नोलॉजी) की अलमारी में मिले खजाने के मामले में दर्ज एफआईआर पर अनुसंधान आगे बढ़ाने के लिए इसी साल 6 अक्टूबर को कार्मिक विभाग को पत्र लिखकर अनुसंधान की अनुमति मांगी थी। कार्मिक विभाग की शिकायत शाखा में यह यह पत्र 16 अक्टूबर को मार्क हुआ। इसके बाद इसे डीओआईटी को भेज दिया गया, लेकिन डीओआईटी के एसीएस अखिल अरोड़ा ही हैं। यहां पिछले दो महीने से यह पत्र गायब हो कर रह गया।
सूत्रों के मुताबिक डीओआईटी के अफसरों को इस पत्र के जवाब में यह लिखने के लिए कहा गया कि मामले में अनुसंधान नहीं बनता, लेकिन चुनाव आचार संहिता को देखते हुए किसी ने इस पर हाथ नहीं रखा। इसके बाद यह फाइल छुपा ली गई। अब राजस्थान में बीजेपी की सरकार सत्ता में आ चुकी है। जिस एफआईआर संख्या 125/2023 को आधार मानकर एसीबी ने मामले में अनुसंधान की अनुमति मांगी है उसी मामले में ईडी भी जांच कर रही है। बीजेपी के तत्कालीन सांसद डॉ. किरोड़ी लाल मीणा के मुद्दा उठाने के बाद ही मामले में ईडी अनुसंधान के लिए आगे आई थी। ऐसे में नई सरकार के शपथ लेने के बाद इस बात की संभावना बहुत ज्यादा है कि मामले में अनुसंधान की अनुमति दी जाए। यानी आने वाले दिनों में अखिल अरोड़ा की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ सकती हैं।
इधर, अरोड़ा के खिलाफ भी ब्यूरोक्रेसी लामबद्ध होती नजर आ रही है। ब्यूरोक्रेसी में अखिल अरोड़ा के खिलाफ प्रॉसीक्यूशन सेंक्शन वाली अमर उजाला की खबर जबरदस्त वायरल हुई। जो अफसर बीते पांच सालों में हाशिए पर थे अब वे इस मामले को लेकर काफी सक्रिय नजर आ रहे हैं।
ये था मामला
योजना भवन जिसमें डीओआईटी का दफ्तर चलता है, उसकी अलमारी में बुलियन और करोड़ों रुपये का कैश बरामद हुआ। मामले को लेकर मुख्य सचिव ऊषा शर्मा और तमाम बड़े अधिकारियों ने प्रेस कांफ्रेंस कर इसकी जानकारी भी दी थी। इसके बाद डीओआईटी के ज्वाइंट डायरेक्टर वेदप्रकाश यादव ने मामले में सामने आकर स्वीकारोक्ति की कि यह सोना और कैश उसका था। उसने अलग-अलग समय पर रिश्वत में ली थी।
किरोड़ी लाल मीणा ने लगाए थे आरोप
भाजपा के तत्कालीन सांसद किरोड़ी लाल मीणा ने सार्वजनिक तौर पर यह आरोप लगाए कि बड़े अफसर को बचाने के लिए सरकार ने छोटे प्यादे को आगे कर दिया। घोटले की सुई डीओआईटी की कंपनी राजकॉम्प इंफो सर्विस लिमिटेड(आरआईएसएल) पर घूम रही थी, जिसमें शीर्ष से लेकर नीचे तक तैनात अफसर बरसों से यहां जमे हुए थे। वित्त विभाग (जिसके एसीएस भी अखिल अरोड़ा ही हैं) ने एक के बाद एक दर्जनों प्रोजेक्ट डीओआई की कंपनी राजकॉम्प इंफो सर्विस लिमिटेड(आरआईएसएल) के मार्फत करवाए।
मिलिभगत का खेल
खास बात ये है कि ज्यादातर प्रोजेक्ट की लागत उनके बजट से कई गुना बढ़ाई गई। आरआईएसएल की लेखा शाखा और एजी की रिपोर्ट में भी इस पर आपत्तियां दर्ज करवाई गईं। ये सब मामले इस बात की ओर इशारा करते हैं कि मिलिभगत का खेल यहां लंबे समय से चल रहा था। आईएफएमएस 3.0 प्रोजेक्ट का घोटाला भी शामिल है। प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 289 करोड़ रुपये आंकी गई थी और अप्रैल 2023 में इसे शुरू होना था, लेकिन प्रोजेक्ट शुरू भी नहीं हुआ और इसके लिए करीब 800 करोड़ रुपये की पांच अलग-अलग निविदाएं जारी जारी कर दी गईं। यही नहीं सीएजी ने भी इस प्रोजेक्ट को लेकर बार-बार आपत्ति जताई थी। इनके अलावा 640 करोड़ रुपये के ई मित्र प्लस मशीन प्रोजेक्ट, 150 करोड़ रुपये का मैन पावर हायरिंग प्रोजेक्ट, ई मित्र एटीएम, भामाशाह डिजिटल पेमेंट किट में भी राजकॉम्प पर गड़बड़ियों के आरोप लगे हैं। जिसकी जांच के लिए लिए एसीबी ने गृह विभाग को पत्र लिखा था।