जोधपुर में एसएन मेडिकल कॉलेज में 2022-23 बैच के स्टूडेंट्स के साथ रैगिंग के मामले में मानव अधिकार आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है। आयोग के अध्यक्ष जस्टिस गोपालकृष्ण व्यास ने जिला कलेक्टर को आदेश जारी कर दस दिन में मामले की जांच कर रिपोर्ट सौंपने को कहा है।
आयोग ने जिला कलेक्टर से उच्च स्तर की महिला पुलिस अधिकारी, एक उपखण्ड अधिकारी स्तर की महिला प्रशासनिक अधिकारी, एक वरिष्ठ पुरुष अधिकारी सहित तीन सदस्यीय जांच समिति गठित कर मामले की तथ्यात्मक रिपोर्ट 10 दिन में मांगी है। आदेश की कॉपी मेडिकल कॉलेज और कमिश्नर को भी भेजी गई है।
बता दें कि यहां पढ़ने वाले एक स्टूडेंट्स की मां ने लिखित में एंटी रैगिंग कमेटी के सदस्यों की ऑफीशियल आईडी पर मेल कर रैगिंग की रोकथाम लिए गुहार लगाई थी। उन्होंने मेल में लिखा कि मेडिकल कॉलेज में रैगिंग के केस दिनों दिन बढ़ते जा रहे हैं, जिसमें बच्चों का हैरेसमेंट करने साथ मेंटल प्रेशर डाल टॉर्चर किया जा रहा है।
मां का आरोप, जब जानकर भी प्रशासन नहीं करता कार्रवाई
मेल में बताया कि सीनियर अपने से जूनियर स्टूडेंट्स को अज्ञात जगह बुलाते हैं, जहां 8-10 सीनियर स्टूडेंट्स पहले ही होते हैं। इतना ही नहीं कभी हॉस्टल में या उनके पीजी में बुलाकर खाना व शराब लाने को कहते हैं। यदि हॉस्टल वार्डन इस ओर ध्यान दें तो हॉस्टल में शराब की बोतलें दिखाई देंगी। रैगिंग में सीनियर स्टूडेंट्स कई बार नए आए बच्चों के प्राइवेट पार्ट को टच करने के साथ गाली-गलौज करते हैं और चिल्लाते हैं। सीनियर अपने असाइनमेंट करने को कहते हैं।
अपने सामने कई घंटे खड़ा रखते है, मुर्गा बनाते हैं, डांस कराते हैं। इस तरह की घटनाएं नए बच्चों में डर का माहौल पैदा कर रही है, जिसका असर बच्चों की पढ़ाई पर भी हो रहा है। स्टूडेंट की मां ने मेडिकल कॉलेज प्रशासन पर आरोप लगाते हुए लिखा कि रैगिंग के बारे में जानकारी होने के बावजूद भी कॉलेज प्रशासन ने कोई एक्शन नहीं लिया। ऐसे बच्चों के खिलाफ जल्द कठोर एक्शन लेना चाहिए।
रैगिंग मानवता को शर्मसार करने वाला कृत्य
आयोग ने कहा कि चिकित्सा महाविद्यालयों में धरती के भगवान कहे जाने वाला चिकित्सक बनने के लिए शिक्षा ग्रहण करने आने वाले स्टूडेंट के साथ दुर्व्यवहार (रैगिंग) मानवता को शर्मसार करने वाला गम्भीर आपराधिक कृत्य है। मानव सभ्यता व मानवीय संस्कारों के विपरीत इस प्रकार के दुर्व्यवहार (रैगिंग) से पीडि़त छात्रों की मानसिकता पर काफी हानिकारक प्रभाव पड़ना सम्भावित रहता है।
पीड़ित छात्र कई बार निराशा, अपमान और क्रोध के आवेग में आत्महत्या भी कर लेते हैं। रैगिंग से बचाव के लिए भारतीय दंड संहिता, यूजीसी रेग्युलेशन्स, 2009 और राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग सहित वर्तमान में विधि स्थापित कानूनों/नियमों के कठोर दण्डात्मक प्रावधान होने पर भी सम्बन्धित लोकसेवकों की संवेदनहीनता के कारण प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से इस प्रकार घटित अमानवीय घटनाओं को आयोग गम्भीरता से लेकर मामले पर प्रसंज्ञान लेता है।