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Rajasthan: बाड़मेर में दलित की बेटी बनी सब इंस्पेक्टर, पढ़ाई छूटी, खेतों में किया काम, पढ़ें संघर्ष की कहानी

Sat, 10 Sep 2022 05:55 PM IST
उदित दीक्षित न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, बाड़मेर

सार

सब-इंस्पेक्टर की वर्दी में लक्ष्मी अपने घर पहुंचीं तो उनके-माता पिता बेटी को देखकर हैरान रह गए। लक्ष्मी ने उन्हें सेल्यूट किया और अपनी टोपी उनके सिर पर रख दी। लक्ष्मी ने अपने माता-पिता को बताया कि अब वह थानेदार बन गई है, यह सुनकर उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
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लक्ष्मी पहली बार घर पहुंची तो माता-पिता को दी सलामी। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सपने जरूर पूरे होते, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए मेहनत और लगन की जरूरत है। लगन ऐसी कि घर में लाइट न हो तो लालटेन की रोशनी में भी पढ़ाई कर सकें। खराब आर्थिक हालात के कारण पिता साइकिल न दिला सके तो पांच किमी दूर पैदल स्कूल जाने का जज्बा हो। अगर, अपने सपनों को पूरा करने के लिए आप यह सब या इससे ज्यादा खराब हलात से गुजरने का दम रखते हैं तो एक न एक दिन आपको सफलता जरूर मिलेगी। राजस्थान के बाड़मेर जिले में रहने वाली लक्ष्मी गढ़वीर ने भी ऐसा ही कुछ कर दिखाया है। आइए अब आपको बताते हैं गरीब परिवार में जन्मी लक्ष्मी की कांस्टेबल और फिर सब इंस्पेक्टर बनने की संघर्ष की कहानी...।  

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बाड़मेर जिले की छोटी-सी ढाणी मेघवालों की बस्ती की रहने वाली लक्ष्मी गढ़वीर आज लोगों के मिसाल बन गई हैं। दलित समाज से वह जिले की पहली महिला सब-इंस्पेक्टर भी बन गईं हैं। लक्ष्मी सिर्फ बाड़मेर जिले में रहने वाले दलित समाज की लड़कियों के लिए ही प्रेरणा नहीं हैं, बल्कि वह प्रदेश और देश की उन तमाम बेटियों के लिए भी एक उदाहरण हैं, जो अपने दम पर कुछ करना चाहती हैं। इसके लिए जरूरत है तो सिर्फ एक लक्ष्य की। अब चलते हैं लक्ष्मी की कहानी पर...।   

झोपड़ी में रहता है परिवार। - फोटो : अमर उजाला
छोटी-सी ढाणी मेघवालों की बस्ती में रहने वाले गरीब परिवार में लक्ष्मी गढ़वीर का जन्म हुआ। शुरू से ही परिवार को आर्थिक तंगी का शिकार था। अच्छी पढ़ाई लिखाई तो दूर जीवन यापन में भी परिवार को परेशानी होती थी। लक्ष्मी के पिता रायचंदराम और मां धापूदेवी के तीन बच्चे हैं। दो बेटे और एक बेटी। बेटी लक्ष्मी घर में सबसे छोटी है, लेकिन उसके सपने बढ़े थे। 

लक्ष्मी ने अपनी पांचवीं तक की पढ़ाई घर के पास मौजूद एक सरकारी स्कूल की। इसके बाद उन्हें पढ़ाई के लिए पांच किमी दूर एक स्कूल में पढ़ने के लिए जाना पढ़ा। परिवार की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी, जिस कारण उन्हें साइकिल नहीं दिलाई जा सकी। लक्ष्मी रोजाना घर से स्कूल और स्कूल से घर तक की यानी 10 किमी की दूरी पैदल ही तय करती थी। लाइट नहीं होने के कारण उन्हें लालटेन की रोशनी में पढ़ना पड़ता। माता-पिता की मदद करने के लिए वह घर और खेत में भी उनकी हाथ बंटाती थी। इसके बाद समय मिलने पर अपनी पढ़ाई करती।  
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दलित समाज की बेटियों के लिए प्रेरणा बनी लक्ष्मी। - फोटो : अमर उजाला
तमाम परेशानियों का सामना करते हुए लक्ष्मी ने 10वीं की परीक्षा पास कर ली, लेकिन अब उनके सामने एक नई चुनौती थी, वो यह कि घर के आसपास कोई सीनियर सैकंडरी स्कूल नहीं था, तो आगे की पढ़ाई कहां करें। दो साल तक लक्ष्मी की पढ़ाई छूटी रही, आखिर में उसके बड़े भाई मुकेश ने उनसे आगे पढ़ाई की पढ़ाई करने के लिए कहा, इस दौरान मुकेश और लक्ष्मी के परिजनों ने उसका पूरा सहयोग किया। 2011 में 12वीं करने के बाद लक्ष्मी ने कांस्टेबल की परीक्षा पास की और पुलिस में भर्ती हो गई। 

कांस्टेबल पद पर चयन होने के बाद लक्ष्मी ने नौकरी ज्वॉइन की, लेकिन संघर्ष जारी रहा। उन्होंने सब-इंस्पेक्टर को अपना नया लक्ष्य बनाया और उसकी तैयारी में जुट गईं। कांस्टेबल रहते हुए लक्ष्मी ने बीए और एमए किया और साथ ही सब-इंस्पेक्टर के लिए भी पढ़ाई की। सब-इंस्पेक्टर की परीक्षा पास करने के बाद उनकी ट्रेनिंग हुई। करीब पांच दिन पहले ट्रेनिंग भी पूरी होने के बाद लक्ष्मी सब-इंस्पेक्टर बन गई। हाल ही में सब-इंस्पेक्टर की वर्दी में लक्ष्मी अपने घर पहुंची तो उनके-माता पिता उसे देखकर हैरान रह गए। लक्ष्मी ने उन्हें सेल्यूट किया और अपनी टोपी उनके सिर पर रख दी। लक्ष्मी ने अपने माता-पिता को बताया कि अब वह थानेदार बन गई है, यह सुनकर उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। 
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