आंखों में बेटे को खोने का गम तो दिल में राम मंदिर बनने की खुशी, अजमेर के रामभक्त अविनाश माहेश्वरी की कहानी कुछ ऐसी है। जिन्होंने बम को दूर फेंककर सैकड़ों कारसेवकों की जिंदगी बचाई थी। अब राम मंदिर समारोह के निमंत्रण का अविनाश के माता-पिता इंतजार कर रहे हैं।
31 साल पहले जिस ढांचे को कारसेवकों ने गिराया था, आज उसी स्थान पर राम मंदिर का निर्माण होने पर पूरे देश में खुशी का माहौल है। हर कोई राम मंदिर के समारोह में जाने के लिए उत्सुक नजर आ रहा है तो अजमेर के रामभक्त अविनाश माहेश्वरी के माता-पिता राम मंदिर समारोह के निमंत्रण का इंतजार कर रहे हैं, जिन्होंने अपने बेटे को राम मंदिर की कार सेवा में खो दिया। अजमेर जिले के फॉयसागर रोड स्थित प्रेम नगर में रहने वाले अविनाश के माता-पिता से बातचीत की तो उन्होंने अपने बेटे के बलिदान की गाथा सुनाई। बातचीत के दौरान अविनाश के माता-पिता की आंखों में अपने बेटे को खोने का दर्द साफ दिखाई दे रहा था। वहीं, राम मंदिर बनने की खुशी भी उनकी जुबान से झलक रही थी।
अयोध्या में 31 साल पहले राम मंदिर को लेकर छह दिसंबर 1992 को देश भर से कारसेवक जुटे थे। राजस्थान के अजमेर से भी 28 लोगों का दल गया था। शाम की गाड़ी से सभी को वापस लौटना था। इस दल में 19 साल का अविनाश भी था। वह अयोध्या पहुंचकर घायलों को हॉस्पिटल पहुंचाने के काम में जुट गया था। टेढ़ा नाम की जगह पर अविनाश और दूसरे लोग राहत कार्यों में जुटे हुए थे। तभी एक अनजान व्यक्ति ने बम फेंक दिया।
अविनाश ने बम पकड़ लिया और सामने की तरफ दो मंजिला मकान पर फेंका। बम छज्जे के नीचे जाकर फट गया। बम फटने के बाद छर्रे अविनाश को जाकर लगे थे। उसे हॉस्पिटल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। अविनाश की तरह कई बलिदानी कारसेवक अयोध्या में राम मंदिर बनने का सपना लेकर इस दुनिया को छोड़ गए थे। अब 22 जनवरी को अयोध्या में श्री रामलला की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा के साथ ही उनका सपना पूरा होगा।
क्या कहा अविनाश की मां ने
अविनाश की मां ने बताया कि हमारा पूरा परिवार 1982 में अजमेर आया था। मेरे पति आरएसएस से जुड़े थे। अविनाश भी उन्हें देखकर 12 साल की उम्र में संघ से जुड़ गया था। आरएसएस की विचारधारा और कार्य उसे पसंद आने लगा था। वह नियमित शाखा में जाता था। पढ़ने में भी होशियार था, उन्होंने बताया कि 26 नवंबर 1992 की बात है, अविनाश अयोध्या जाने की जिद्द करने लगा था। मुझसे बोला, मैं अयोध्या जाऊंगा। मैंने उसे मना किया था, वह गुस्से में अपने कमरे में गया और रोते-रोते सो गया था। उसने अयोध्या जाने की ठान ली थी।
बिना बताए दोस्त के साथ गया अयोध्या
अविनाश की मां ने बताया कि 28 नवंबर को सुबह पांच बजे उसका दोस्त घर पर आया था। उसने अविनाश को आवाज लगाई थी। दोस्त की आवाज सुनने के बाद वह नींद से उठा और अपना बैग लेकर चला गया। घर से निकलने के बाद अपने पिता की डिस्पेंसरी पर गया था। पिता को अयोध्या जाने की बताई थी। पिता से मिलने के बाद दोस्त के साथ अयोध्या के लिए रवाना हो गया था।
अविनाश के पिता मानक चंद माहेश्वरी 2008 को मेडिकल डिपार्टमेंट से रिटायर्ड हुए थे। उस समय को याद करते हुए वे बोले, तब पता चला था कि आरएसएस से जुड़े लोग अयोध्या जा रहे हैं। बेटे ने जाने की जिद्द की थी। मैंने उसे कहा था, पहले मैं जाऊंगा फिर तू चला जाना। लेकिन वह जाने की जिद्द करता रहा। उसकी जिद्द के आगे मैंने भी परमिशन दे दी।
28 नवंबर 1992 को घर से निकलने के बाद मुझसे डिस्पेंसरी मिलने आया था। मैंने उसे कहा था, जो भी तुम्हें काम दे, वह सब अच्छे से कर लेना। अयोध्या के लिए अजमेर से 28 लोगों की एक टोली गई थी। अविनाश के पिता ने बताया कि आरएसएस से संपर्क होने के कारण छह दिसंबर को बेटे के बलिदान की जानकारी मिल गई थी। पत्नी को इस बारे में कुछ नहीं बताया था। सात दिसंबर से देश में कर्फ्यू लग गया था।
बेटे को खोने का गम आज भी
अपने इकलौते बेटे को खोने का गम अविनाश के माता-पिता के चेहरे पर साफ देखा जा सकता था। 31 साल बीत गए, लेकिन अब भी दोनों के लिए उस हादसे को दोबारा याद करना किसी यातना से कम नहीं था। आज भी बूढ़े मां-बाप अपने बेटे की पुरानी तस्वीरों को देखकर उनको याद करते हैं और इन्हीं आंखों से उनके आंसू निकल आते हैं।
अविनाश के पिता ने बताया कि आठ दिसंबर को एसडीएम का फोन आया था। जयपुर-अजमेर बाइपास पर अधिकारियों के साथ शिनाख्त करने के लिए बुलाया गया था। वहां जाकर बेटे की शिनाख्त की थी। बेटे के गले और चेहरे पर जख्म थे। बेटे के जख्मी चेहरे को उसकी मां कैसे देख पाती। वो दुनिया तो छोड़कर चला ही गया था। लेकिन एक मां को कैसे समझाता। डॉक्टर प्रवीण को बुलाकर बेटे के जख्मों पर मरहम-पट्टी कराई।
अविनाश के माता-पिता घटना के दो साल बाद उस जगह गए थे, जहां अविनाश के साथ हादसा हुआ था। उन्होंने बताया कि वहां एक व्यक्ति ने अपना नाम बताए बिना पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी थी। वह व्यक्ति डर-डर कर घटना के बारे में बता रहा था, इसके बाद वे चार धाम यात्रा पर गए थे।
निमंत्रण मिलने का है इंतजार :
अविनाश के माता-पिता ने बताया कि राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव के लिए उन्हें व्हाट्सएप पर आमंत्रण मिला है। उन्हें लिखित आमंत्रण-पत्र का इंतजार है। उन्होंने रिजर्वेशन भी करवा लिया है, ताकि वे अपनी पत्नी के साथ रामलला के प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव में साक्षी बन सकें। वे बोले, जिस काम के लिए हमारा बेटा वहां गया और अपना बलिदान दिया, वह काम अब पूरा हो रहा है। हमारे बेटे का बलिदान सार्थक हुआ। उसके बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
अविनाश माहेश्वरी के पिता ने बताया कि 22 जनवरी को रामलला के दर्शन के लिए 31 सालों तक इंतजार किया है। उन्होंने कहा कि लिखित निमंत्रण नहीं मिलने पर यहां पर ही अखंड श्री रामायण पाठ का आयोजन रखेंगे।