सावन का महीना सोमवार से शुरू होने के साथ ही भगवान भोलेनाथ के मंदिरों में भक्तों की भीड़ लगना शुरू हो गई है। हर कोई भगवान भोलेनाथ को रिझाने के लिए उनकी आराधना में मग्न हो रहा है। देवों के देव महादेव के जितने अनगिनत भक्त हैं, धरती पर महादेव के उतने ही शिवलिंग विराजमान हैं। इनमें से कुछ तो हजारों वर्ष पुराने हैं, ऐसा ही एक शिवलिंग अजमेर जिले के अजयसर में स्थित है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसकी स्थापना जगतपिता ब्रह्मा ने की थी।
अजमेर में शहर से करीब 16 किलोमीटर दूर अजयसर गांव में अरावली पहाड़ियों के बीच अजगंधेश्वर महादेव मंदिर स्थित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मंदिर में विराजित शिवलिंग सृष्टि की रचना से पहले से है। कहा जाता है कि स्वयं जगतपिता ब्रह्मा ने अजगंधेश्वर शिवलिंग की स्थापना की थी, जिसे श्रद्धालु बकरेश्वर महादेव के नाम से भी जानते हैं।
पुराणों और धार्मिक शास्त्रों के मुताबिक पुष्कर को जगतपिता ब्रह्मा की नगरी कहा जाता है। बताया जाता है कि यहीं से जगतपिता ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी, लेकिन उससे पहले अपनी बसाई नगरी में सृष्टि यज्ञ किया था। सृष्टि यज्ञ में जब दानव असुर विघ्न डालने लगे तब जगतपिता ब्रह्मा ने पुष्कर के चारों ओर भगवान शिव के शिवलिंग स्थापित किए, जिससे महादेव सृष्टि यज्ञ की रक्षा करें। इन चार शिवलिंगों में से एक है अजगंधेश्वर महादेव। मंदिर के चारों ओर पहाड़ियां और जंगल हैं। मंदिर के समीप प्राकृतिक बरसाती झरना है और ठीक पीछे जंगल में एक छोटी-सी बावड़ी है, जिसे गंगा बावड़ी के नाम से जाना जाता है।
सावन में लगती है भीड़
अजगंधेश्वर महादेव प्रमुख तीर्थ स्थल है, जहां सावन के महीने में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। वहीं प्राकृतिक सौंदर्य के कारण यह पिकनिक स्पॉट भी है। इस पावन स्थल में आज भी मंदिर पर उभरी हुई कलाकृतियां नजर आती हैं, जो उस समय के स्थापत्य और सभ्यता को प्रदर्शित करती हैं।
अज का अर्थ होता है बकरा, इसलिए इन्हें बकरेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। यहां की महिमा बताते हुए स्थानीय पुरोहित कहते हैं कि पुष्कर में वशकली नाम के एक असुर ने 10 हजार वर्षों तक घोर तपस्या की थी। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर जगतपिता ब्रह्मा ने उसे वरदान दिया था, उसकी मृत्यु किसी भी देवी-देवता, त्रिदेव और मनुष्य के हाथों नहीं होगी, साथ ही कोई अस्त्र-शस्त्र उसे नुकसान नहीं पहुंचा पाएगा। जगतपिता ब्रह्मा के आशीर्वाद से दानव ने इंद्रलोक को जीत लिया। भगवान इंद्र ने जगतपिता ब्रह्मा से सहायता मांगी तब ब्रह्माजी ने इंद्र को शिव की तपस्या करने का सुझाव दिया।
इंद्र की तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने वशकली दानव का वध करने का वचन दिया। एक दिन जब दानव पुष्कर सरोवर में स्नान और पूजा करने के बाद अपने विलास में लौट रहा था, तब उसने एक बड़े से बकरे को देखा जो आम बकरे से काफी बड़ा था, उस बकरे को देखकर दानव की तामसी प्रवृत्ति जागृत हो गई और बकरे का मांस खाने के इरादे से उसने बकरे का पीछा करना शुरू कर दिया । बकरे के पीछे दौड़ते हुए वह दानव इसी स्थान पर पहुंचा और यहां बकरे के सींग से महादेव ने दानव का अंत कर दिया।
इसके बाद ब्रह्माजी ने महादेव से यहीं पर रुकने का वचन लिया लेकिन महादेव ने वचन का मान रखते हुए वर्ष में 1 दिन पूरे परिवार के साथ यहां विराजमान होने की बात कही। बताया जाता है कि कार्तिक माह की चौदस को भगवान शिव शंकर अपने परिवार के साथ यहां विराजते हैं। अनूठी बात यह है कि आज भी श्रद्धा के साथ जो भी भक्त शिवलिंग को जल अर्पित करने के बाद अपने दोनों हाथों से शिवलिंग को रगड़ता है, उसके हाथों में बकरे की गंध आती है, खास बात यह है कि यह गंध हर किसी को नहीं आती। कहा जाता है कि शिव के सच्चे भक्तों को ही यह अनुभूति होती है।
मंदिर के समीप ही अजमेर के संस्थापक राजा अजयपाल की समाधि है। महाराज अजय पाल महादेव के अनन्य भक्त थे और प्रतिदिन महादेव के शिवलिंग पर जल चढ़ाया करते थे। बताया जाता है कि अपनी सिद्धियों के जरिए अजयपाल हरिद्वार से गंगा जल लेकर आते थे, उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर गंगा मैया ने उन्हें वरदान दिया था कि अब उन्हें यहां आने की जरूरत नही है वे स्वयं वहीं प्रकट होंगी। मंदिर के पीछे जंगल मे गंगा बावड़ी वह स्थान है, जिसका जल कभी नहीं सूखता। उन्होंने बताया कि यहां के बाद अजमेर को वर्तमान जगह पर बसाया गया था।