पंजाब में सिख धर्म बेहद प्रभावी है। यहां की लगभग 58 फीसदी जनता सिख धर्म को मानती है। हिंदू 38.49 फीसदी के साथ दूसरे नंबर पर हैं। लेकिन व्यवहार में समाज का बड़ा हिस्सा सिख धर्म से प्रभावित है। वहां समाज कई अलग-अलग स्तरों पर बंटा अवश्य है, लेकिन सबके मूल में सिख धर्म ही ताकतवर है और सिख धर्म की राजनीति में अकाली दल परंपरागत तौर पर बेहद प्रभावी है जिस कारण यहां किसी दूसरे धर्म की राजनीतिक ताकत अपेक्षाकृत नगण्य ही रही।
भाजपा की केंद्रीय टीम के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा कि पार्टी पंजाब में अकाली दल के भरोसे रह गई। अकालियों से समझौते के कारण उसने पंजाब में कभी अपने स्वतंत्र विकास के बारे में कोई ठोस रणनीति नहीं अपनाई। अकाली दल ने भाजपा को लोकसभा में तीन सीटें और विधानसभा में 23 सीटों पर लड़ने का समझौता किया। इससे पार्टी अमृतसर और गुरदासपुर जैसे कुछ क्षेत्रों तक ही सिमटकर रह गई और इसका वैचारिक विस्तार नहीं हो पाया।
भाजपा नेता सरदार आरपी सिंह ने कहा कि भाजपा सहयोगी धर्म को निभाती है, यही कारण है कि अकालियों के साथ के कारण पार्टी ने पूरी ताकत के साथ यहां अपना वैचारिक विस्तार नहीं किया। लेकिन अब वह गठबंधन टूट गया है और अब भाजपा यहां अपना विस्तार करने के लिए तैयार है। उन्होंने दावा किया कि इस विधानसभा चुनाव में भाजपा अपना आधार बढ़ाने में सफल रहेगी।
सफल होगी राष्ट्रीय विचारधारा
आरएसएस के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की हजारों शाखाएं पंजाब में भी लगातार चल रही हैं। यह समाज के लोगों तक पहुंचने का उनका सबसे बड़ा माध्यम है। इस नेता के मुताबिक, चूंकि आरएसएस के लिए राष्ट्र सबसे पहला मुद्दा है और इसके लिए वह समाज के हर धर्म और हर वर्ग के लोगों को साथ लेकर चलने में विश्वास रखती है, पंजाब में भी इस तरह की कोशिश जारी है।
नेता के मुताबिक, यह सही है कि हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान के पड़ोसी राज्यों में संघ परिवार को जितनी सफलता मिली है, उतनी सफलता पंजाब सूबे में नहीं मिल पाई है। लेकिन देश और पड़ोसी देशों में जिस तरह की परिस्थितियों का निर्माण हो रहा है, उसमें राष्ट्रवाद मजबूत होगा। अनुमान है कि इन परिस्थितियों में राष्ट्रवादी ताकतों को ही सफलता मिलेगी।