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पंजाब के विकास का रोडमैप तैयार नहीं करता बजट

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पटियाला। केंद्र की ओर से पेश किए बजट से देश का पेट भरने वाले पंजाब के विकास का कोई रोडमैप तैयार नहीं हो पाएगा। यह कहना है पंजाबी यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र विभाग के पूर्व प्रमुख प्रोफेसर बलविंदर सिंह टिवाणा का। उनका कहना है कि इस समय कर्जों के बोझ तले दबे पंजाब की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। पिछले दो वर्षों में कोरोना संकट के कारण यहां की इंडस्ट्री बुरी तरह से दम तोड़ रही है। बावजूद इसके बजट में इंडस्ट्री को दोबारा से खड़ा करने और लोगों के लिए रोजगार के साधन पैदा करने को कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।
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इंडस्ट्री को सही मायनों में तभी दोबारा से पटरी पर लाया जा सकेगा, जब यहां तैयार होने वाले उत्पादों की मांग बढ़ेगी। यह तभी हो सकेगा, जब लोगों के पास इन उत्पादों को खरीदने के लिए पर्याप्त पैसा होगा। लेकिन बढ़ती बेरोजगारी व महंगाई से फिलहाल यह असंभव लग रहा है।
अमर उजाला से बात करते हुए प्रोफेसर टिवाणा ने कहा कि चुनावों के नजदीक पेश किए बजट को लेकर खासतौर से पंजाब के लोगों को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन इसके विपरीत बजट मात्र जुमलेबाजी ही लग रहा है। बजट में रोजगार पैदा करने का एक बड़ा जरिया माने जाने वाली इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के लिए कुछ खास नहीं दिया गया है। पहले ही पंजाब में इंडस्ट्री कम है और पिछले दो सालों में कोरोना के कारण जो बची इंडस्ट्रीज थी, उन पर भी बड़ी मार पड़ी है। केंद्र को चाहिए था कि इस बजट में कोरोना संकट के कारण बेहाल हो चुकीं इंडस्ट्री को दोबारा रफ्तार देने को ठोस हल लाती, परंतु ऐसा नहीं हुआ। बजट में इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के लिए कोई विशेष आर्थिक पैकेज या फिर कोई बड़ी योजना होनी चाहिए थी। यह न होने से उद्यमियों व उद्योगपतियों को निराशा हाथ लगी है।
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बजट में प्रमुख सेक्टरों पर कोई फोकस नहीं : प्रोफेसर जसविंदर सिंह बराड़
पंजाबी यूनिवर्सिटी के ही अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर जसविंदर सिंह बराड़ ने कहा कि बजट में इंडस्ट्री व खेतीबाड़ी दोनों ही प्रमुख सेक्टरों पर कोई फोकस नहीं किया गया है। इंडस्ट्री सेक्टर के विकास के लिए सबसे जरूरी मांग बढ़ाने को कोई कदम नहीं उठाया गया। मांग तभी बढ़ सकती है कि बढ़ती महंगाई पर काबू पाने के साथ-साथ रोजगार के साधन बढ़े, परंतु बजट में इस तरफ ध्यान नहीं दिया गया है। उधर खेतीबाड़ी सेक्टर में किसानों और मजदूरों को इस साल के बजट में कुछ देने की बजाए घटाया गया है। एमएसपी के लिए रखे 2.37 लाख करोड़ रुपये पिछले साल से भी कम हैं। पिछले साल यह बजट 2.48 लाख करोड़ था, जिससे एमएसपी पर फसलों की खरीद कम होने की आशंका पैदा हो जाती है।
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