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Fathers Day: कारपेंटर पिता ने आर्थिक तंगी को नहीं आने दिया आड़े, बेटे ने लगाया सटीक निशाना

Sun, 19 Jun 2022 08:20 AM IST
निवेदिता वर्मा रिंपी गुप्ता, अमर उजाला, पटियाला (पंजाब)

सार

विशाल ने बताया कि तीरंदाजी के उपकरण करीब सवा लाख रुपये के आते थे। पिता के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह इन्हें खरीद कर दें। किसी तरह से पिता ने प्रयास करके कुछ रकम जमा की।
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तीरंदाज विशाल कुमार - फोटो : फाइल
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विस्तार
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मैं छठी कक्षा में था जब तीरंदाजी के प्रति रुचि जागी। पिता गुलजारी लाल कारपेंटर थे। परिवार में चार भाई बहन और थे। ऐसे में पिता से अपनी बात कहने में झिझकता रहा। कई दिनों तक उलझन में रहा। एक दिन पिता ने पूछा तो उन्हें अपने दिल की बात बताई। पिता पहले तो चुप रहे फिर बोले-अपना सपना पूरा करो। मैं हर संभव मदद करूंगा। इसके बाद मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उनकी बदौलत न केवल राष्ट्रीय स्तर का तीरंदाज बना बल्कि एक अधिकारी के रूप में समाज की सेवा भी कर रहा हूं। उन्होंने कभी आर्थिक तंगी का साया मुझ पर नहीं पड़ने दिया। आज वह दुनिया में नहीं हैं, लेकिन जो कुछ भी हूं, उसका श्रेय उन्हीं को जाता है।  

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यह कहानी पटियाला के विशाल कुमार की है। विशाल मोहाली में बतौर फायर ऑफिसर तैनात हैं। विशाल बताते हैं कि उनकी सफलता के पीछे पिता की मेहनत छुपी है। साल 1991 में जब वह एसडीएसई सीनियर स्कूल में छठी क्लास में थे, तो वह अपनी बड़ी बहन प्रेमलता को पोलो ग्राउंड में तीरंदाजी की प्रैक्टिस के लिए छोड़ने जाते थे। उनका भी इस खेल के प्रति रुझान पैदा हो गया।

पिता की अनुमति के बाद पढ़ाई के साथ-साथ तीन-चार वर्षों तक तीरंदाजी का अभ्यास चलता रहा। उस समय तीरंदाजी के उपकरण करीब सवा लाख रुपये के आते थे। पिता के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह इन्हें खरीद कर दें। किसी तरह से पिता ने प्रयास करके कुछ रकम जमा की। उनका अच्छा खेल देखते पंजाब आर्चरी एसोसिएशन ने उन्हें एक उपकरण मुफ्त में मुहैया करा दिया। 1996 में राजस्थान के पुष्कर में हुए मुकाबले में वह नेशनल चैंपियन रहे। 1998 में कोलकाता में स्कूल नेशनल चैंपियन बने।
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वर्ष 2000 में राष्ट्रीय तीरंदाजी चैंपियनशिप में ओवरऑल दूसरे स्थान पर रहे। वर्ष 2001 में हुई नेशनल गेम्स के तीरंदाजी इवेंट में वह ओवरऑल पहले स्थान पर रहे। विशाल पटियाला के पोलो ग्राउंड में शाम के समय बच्चों को तीरंदाजी की ट्रेनिंग भी देते हैं। विशाल कहते हैं कि वह खास तौर से उन बच्चों को ट्रेनिंग देते हैं, जिनके घर की आर्थिक हालत ज्यादा मजबूत नहीं है। जितनी भी हो सके, अपने स्तर पर उन बच्चों की वह मदद भी करते हैं।
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