फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आजादी से पहले बसे थे गांव लेकिन अभी तक नहीं बस सुविधा का इंतजाम

विज्ञापन
विज्ञापन
नयागांव। देश को आजाद हुए 75 साल हो गए हैं। पूरे देश में आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है लेकिन अभी भी राज्य की राजधानी से सटे 12 से अधिक गांव ऐसे हैं, जहां पर बस सुविधा नहीं है। लोगों को रोज घंटों पैदल चलकर अपनी मंजिल तक पहुंचना पड़ता है। यह मामला इलाके के नेताओं से लेकर प्रशासन के ध्यान में भी है लेकिन इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया जाता है। हालांकि इतना जरूर है कि मतदान वाले दिन नेताओं की गाड़ियां लोगों की मदद के लिए पहुंच जाती हैं।
विज्ञापन

शिवालिक की पहाड़ियों के बीच में बसे गांव टांडा, टांडी काने का बाड़ा, मसोल गुडा, कसौली, भघिंडी, करौंदेवाल, छोटी-बड़ी नग्गल, मिर्जापुर जैसे दर्जनभर गांव ऐसे हैं जिसमें लोगों को आज तक अपने घर जाने के लिए बस का सफर नसीब नहीं हो पाया है। लोग आजादी के बाद से ही इलाके में बस सुविधा के लिए मांग करते आ रहे हैं लेकिन किसी भी सरकार ने उनकी नहीं सुनी। इस कारण इलाके के बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है। इतना ही नहीं कई लोग तो इसी चक्कर में गांवों को छोड़कर चंडीगढ़, नयागांव और खरड़ में बस गए ताकि अपने भविष्य को बढ़िया बना सकें। जो लोग यहां रहते हैं, उनका कहना है कि अगर आठ बजे चंडीगढ़ में स्कूल लगते हैं तो बच्चों को करीब पांच बजे घरों से भेज देते हैं। ऐसी ही स्थिति शाम के समय होती है। बस सुविधा न होने से रिश्तेदार तक भी आने से कतराते हैं। युवाओं की शादियों को लेकर दिक्कत आती है। ऐसा लगता ही नहीं है कि चंडीगढ़ के पास रह रहे हैं। सरकार को इस दिशा में कदम उठाने होंगे।
स्कूल जाने के लिए जान जोखिम में डालते हैं बच्चे
गांव मसोल टांडी एवं काने के बाड़ा में प्राइमरी स्कूल हैं। उसके बाद पढ़ने जाने के लिए उन्हें गांव टांडा जाना पड़ता है। इसके रास्ते में तीन-चार जगह पटियाला की राव नदी आती है। उस पर पुल भी नहीं है। बच्चों को पैदल ही स्कूलों तक पहुंचना होता है। बस की कोई व्यवस्था न होने के कारण बरसात के दिनों में बच्चों को अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती है। यही नहीं दसवीं से ऊपर की शिक्षा के लिए करीब 10-12 किलोमीटर दूर तक पैदल जाना पड़ता है।
विज्ञापन

आज भी ऊंट यातायात के साधन
कई गांव ऐसे हैं जिनकी सीमा हरियाणा से लगती है। कोई यातायात के साधन न होने के कारण ग्रामीण बीमारी की स्थिति में मरीज को ऊंट पर बिठाकर हरियाणा की सीमा में लेकर जाते हैं। इस कारण पहले कई मौत भी हो चुकी हैं। ट्राइसिटी में लगने वाले मेलों में जो ऊंट वाले दिखते हैं, वे भी इन्हीं गांवों से संबंध रखते हैं।
आजादी के 75 साल भी बुरा हाल
आजादी के 75 साल बाद भी ग्रामीण काफी बुरी जिंदगी जी रहे हैं। गांव तक यातायात के कोई साधन नहीं है। मेहनत मजदूरी करने वाले लोग पैदल या खुद के साधन से जाते हैं। -नछत्तर सिंह, वासी गांव टांडा
पैदल चलने के लिए रास्ते नहीं, बस तो दूर की बात
गांव तक पैदल पहुंचने के रास्ते ही नहीं हैं। बस तो बहुत दूर की बात है। इलाके के कई बुजुर्ग बसों की मांग करते करते अपनी जिंदगी पूरी कर चुके हैं लेकिन आज तक यातायात के साधन के लिए बस नसीब नहीं हुई है। -कुलदीप सिंह, वासी गांव टांडा
दो महीने में चार लोगों ने गंवाई जान
सरकारे हमारे इलाके को अछूत समझती है। किसी भी सरकार ने इलाके के विकास के लिए कोई काम नहीं किया है। इसका खामियाजा लोग उठा रहे हैं। दो महीने में चार लोग जान गंवा चुके हैं। -सुरिंदरा देवी, वासी गांव काने का बाड़ा
सरकार के खिलाफ संघर्ष करेंगे
अगर हमारी समस्या का समाधान नहीं किया गया तो सभी लोग मिलकर सरकार के खिलाफ एक बड़ा प्रदर्शन करेंगे। चुनाव के समय नेता आकर बड़े-बड़े वादे करते हैं लेकिन बाद में भूल जाते हैं। -क्रिमिता देवी, वासी गांव काने का बाड़ा
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें