फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

खुशी के माहौल में दिखे किसानों के घरवाले, घर लौटेंगे हमारे खेतों के रखवाले

विज्ञापन
विज्ञापन
मोहाली। एक साल तेरह दिन से चला किसान आंदोलन वीरवार को संयुक्त किसान मोर्चे की ओर से वापस लेने का एलान कर दिया गया है। ऐसे में दिल्ली की सीमाओं पर साल से बैठे किसानों का घर लौटना साफ हो गया है। वहीं, संघर्ष जीत के साथ संपन्न होने से किसान और उनके परिवारों में खुशी की लहर है। घर वालों का कहना कि भले ही संघर्ष के दौरान परिवारों ने दिक्कते उठाई हैं, लेकिन अब वह खुश है कि खेतों के रखवाले घर लौट रहे हैं। उनके खेत अब सुरक्षित है। वहीं, किसानों का कहना था कि उन्हें आंदोलन की खुशी तो है लेकिन यहां जो एक साल से नए रिश्ते बने है उनसे दूर जाने पड़ेगा। वहीं जो किसान हमारे साथ आंदोलन में शामिल हुए थे, वे अब हमारे साथ घर वापस नहीं जा पाएंगे।
विज्ञापन

दादी और रिश्तेदारों ने गीत गाकर मनाई खुशियां
पिछले एक साल से लगातार दिल्ली आ जा रहे थे। साथ ही मोहाली के सेक्टर-66 में चल रहे बेस्टेक मॉल पर भी मोर्चा लगाया हुआ है। ऐसे में उनकी दादी, चाची, और मामी की ओर से किसानों के आंदोलन को खत्म होने की खुशी मनाई। तीनों महिलाओं की ओर से खुशी के गीत गाए गए, साथ ही परिवार के सभी सदस्यों को बधाई दी। वहीं, दादी ने बताया कि उन्हें खुशी है कि उनका पोता अपने खेतों में आजाद होकर काम कर सकता है। सरकार के बुरे इरादों को किसानों ने अपनी हिम्मत के साथ जीता है।
- मनदिंर सिंह निवासी गांव चिल्ला।
खुशी है कि संघर्ष कामयाब रहा
मेरा बेटा गुरप्रीत सिंह धालीवाल 2020 से किसान आंदोलन से जुड़ा हुआ है। इस एक साल के दौरान जब भी घर आया तो सिर्फ कुछ समय के लिए रुका। उसका दिल और दिमाग हमेशा संघर्ष की कामयाबी पर लगा रहता था। वह कभी दिल्ली तो कभी पंजाब के अलग-अलग कोनों में होने वाली किसानों की सभाओं में जाता था। वहीं घर में भी बच्चे परेशान हो गए थे कि उनके पिता उनके साथ दस मिनट भी नहीं बैठते। वहीं, उन्हें उन्हें खुशी है कि तीन कृषि कानून सरकार ने वापस ले लिए हैं। वहीं, परिवार वालों में खुशी है कि संघर्ष कामयाब रहा है।
विज्ञापन

- मनजीत कौर, निवासी गांव मटरा।
संघर्ष में जान गंवाने वालों का दुख रहेगा हमेशा
पिछले एक साल से सिंघु बॉर्डर पर अपने गांव की तीन ट्रैक्टर ट्रॉलियों के साथ बैठे थे। वे साल में कुछ दिन ही घर पर रहे। लेकिन उन्होंने अधिक समय दिल्ली के बॉर्डर पर बिताया है। हमारे सामने ही कई ऐसे लोग थे जो आंदोलन की शुरूआत से हमारे साथ रहे, लेकिन आंदोलन में ही उनकी मौत हो गई। इस चीज का दुख हमें जिंदगी भर रहेगा। वहीं, घर की जिम्मेदारी बेटे और पत्नी ने संभाला था।
विज्ञापन

-सुखविंदर सिंह, निवासी कुरड़ी।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें