मोहाली। आज महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के बराबर चल रही हैं। देश के कई उच्च पदों पर भी महिलाएं तैनात हैं। कोविड महामारी में महिलाओं की भूमिका अहम रही है। वीरवार को विश्व महिला समानता दिवस मनाया जा रहा है। ऐसे में हम आपको जिले की उन चार महिलाओं से रूबरू करवाने जा रहे हैं, जिन्होंने अपने काम के दम पर एक अनूठी मिसाल कायम की है। महिलाओं ने सेहत, पुलिस प्रशासन और समाज सेवा के क्षेत्र में अपनी अहम भूमिका निभाकर एक अनूठी मिसाल कायम की है।
कहने से नहीं, सोच बदलने से आएगी समानता
मुझ जैसी कई महिलाएं उच्च पदों पर काम कर रही हैं। वह अपनी निजी जिंदगी के साथ सामाजिक जिम्मेदारियों को भी निभा रही हैं। मुझे अपने पेशे में कभी ऐसे महिला पुरुष भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा। लेकिन वहीं जब निजी जीवन की बात आती है तो मुझ जैसी महिला को मिलने वाली तरक्की परिवार के हिसाब से चुननी पड़ती है। वहीं आने वाली पीढ़ी की बात की जाए तो मैंने अपने बेटे को हर वो काम सिखाया है जो मैं खूद करती हूं। समानता कहने से नहीं सोच बदलने से आए आएगी।
- डॉ. आदर्श पाल कौर, सिविल सर्जन मोहाली।
कुदरत ने दिया महिलाओं को समानता का हक
कभी नहीं सोचा की वह एक महिला ऑफिसर है। खुद को एक महिला मुलाजिम ही समझती हैं। बराबरी का हक महिलाओं को कोई नहीं दे सकता। यह तो कुदरती तौर पर मिला। क्योंकि हम दुनिया की आधी आबादी का हिस्सा हैं। तो कोई हमें बराबरी का हक क्यू देगा। मैंने अपने जीवन में कभी भेदभाव का सामना नहीं किया। परिवार में हमें बराबर ही समझा जाता था, आज वही समानता की शिक्षा मैं अपने परिवार में दे रही हूं। महिलाओं का शिक्षित होना बहुत जरूरी है।
- रवजोत कौर ग्रेवाल, एसपी देहाती मोहाली।
बच्चो को समानता का मतलब समझाने में मां की भूमिका अहम
एक बच्चा 18 साल तक बच्चा ही होता है। ऐसे में उसे जो सिखाया जाएगा, वैसी ही छवि लेकर वह बड़ा होगा। बच्चा अधिक समय अपनी मां के साथ रहता है, अगर मां सशक्तिकरण में विश्वास रखती होगी, तो वह बच्चों को समानता का मतलब समझा पाएगी। क्योंकि हमारे समाज में एक लड़के या पुरुष को उनकी मां के द्वारा ही बोला जाता है कि लड़के रोते नहीं वे कभी हार नहीं मानते, जबकि लड़कों में भी भावनाएं होती हैं। जहां महिलाओं को अपने जीवन में कुछ भी करने के लिए एक पुरुष से ज्यादा प्रयास कर के अपनी मंजिल को हासिल करना पड़ता था। जहां उनकी सामाजिक जिम्मेदारी उनका पीछा नहीं छोड़ती थी। वहीं पुरुष सामाजिक जिम्मेदारी छोड़कर आसानी से आगे बढ़ सकते थे।
- नवनीत कौर, जिला बाल संरक्षण अधिकारी।
समाजसेवी हूं, महसूस होती है बराबरी की कमी
अगर किसान आंदोलन के शुरुआत की बात करें तो कई ऐसे मौके आए हैं, जहां उनके पेशे से जुड़े लोगों ने उन्हें पीछे हटने को कहा। जिनमें महिला अभिनेत्रियां भी शामिल हैं। जो मेरी तरह ही पंजाब के किसान परिवार से आती हैं। लेकिन मैं समझती हूं कि फिल्मी दुनिया एक बनावटी दुनिया है। जिस पर यकीन करना मुश्किल है। वहीं सबसे अधिक हैरानी मुझे इस आंदोलन में हुई, जहां महिलाएं किसान पुरुषों के मुकाबले कम दिखीं। वहीं कहीं न कहीं, आंदोलन के दौरान ही मुझे भी महिला होने का एहसास करवाया गया जो गलत है। मैंने किसान आंदोलन के दौरान देखा कि कई पुरुष किसान नेताओं में पितृसत्ता के गुण हैं चाहे वे पंजाब से हों या हरियाणा से। लेकिन मैं समानता में विश्वास रखती हूं। आंदोलन में शामिल होने का मेरा फैसला है। - सोनिया मान, अभिनेत्री और समाजसेवी।