पंजाब विधानसभा चुनाव में राजनीतिक पार्टियों ने अपने दांव पेंच लगाने शुरू कर दिए हैं। खासकर इस बार चुनाव में पंजाब के 32 फीसदी एससी वोट बैंक पर तमाम राजनीतिक दलों की नजर है। दोआबा में एससी वोट 42 फीसदी है और इसलिए यह क्षेत्र नेताओं का केंद्र बिंदु बन गया है। इतिहास भी गवाह है कि एससी बिरादरी का वोट पूरी तरह कभी किसी पार्टी के साथ नहीं रहा। एससी वोट आमतौर पर कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल के बीच बंटता रहा है। बीच में बीएसपी ने इसमें सेंध लगाने की कोशिश की लेकिन उसे भी एकतरफा समर्थन नहीं मिला। पंजाब का होने के बावजूद कांशीराम अपनी पार्टी को यहां बड़ी कामयाबी नहीं दिला पाए।
पंजाब में एससी वोट अलग-अलग वर्गों में बंटा है। यहां अधिकतर वोट रविदासी, वाल्मीकि भाईचारा, मजहबी सिख, भगत बिरादरी का है। देहात में रहने वाले एससी वोटरों में एक बड़ा हिस्सा डेरों से जुड़ा हुआ है। गांवों में मजहबी सिखों का बोलबाला है जबकि दोआबा में रविदासिया व भगत बिरादरी का। आंकड़ों की अगर बात की जाए तो पंजाब की अनुसूचित जातियों में सबसे बड़ा 26.33 प्रतिशत मजहबी सिखों का है। वहीं रामदासिया समाज की आबादी 20.73 प्रतिशत है, जबकि आदि धर्मियों की आबादी 10.17 और वाल्मीकि भाईचारे की आबादी 8.66 फीसदी है।
कांग्रेस ने रविदासिया समाज से चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम बनाया है। यह कांग्रेस का मास्टर स्ट्रोक है। सीएम चन्नी दो बार रविदासिया समाज के डेरे सच्चखंड बल्लां में माथा टेककर आर्शीवाद ले चुके हैं। कांग्रेस चन्नी के बल पर एससी वोट को आकर्षित करने के लिए पूरी ताकत झोंकने जा रही है। कांग्रेस के फ्रायर ब्रांड दलित नेता डॉ. राजकुमार वेरका अब मंत्री बन चुके हैं। इसके अलावा पूर्व सांसद मोहिंदर सिंह केपी को भी कैबिनेट रैंक दिया गया है।
भाजपा ने 2022 में अपना सीएम एससी बिरादरी से बनाने की घोषणा कर रखी है। भाजपा ने पंजाब से रविदासिया बिरादरी के नेता विजय सांपला को एससी आयोग का चेयरमैन बना रखा है। जबकि सोमप्रकाश को केंद्रीय राज्यमंत्री। दोनों नेताओं के कंधों पर दारोमदार है। सांपला के बेटे साहिल सांपला के शाम चौरासी से मैदान में उतारने की तैयारी की जा रही है।
अकाली दल ने बसपा को अपना सारथी बना लिया है। बसपा को पिछले विधानसभा चुनाव में 1.5 फीसदी मत मिले थे लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा का कई स्थानों पर अच्छा प्रदर्शन रहा। अकाली दल के पास एससी बिरादरी के धुरंधर नेता हैं, जिसमें पवन कुमार टीनू, बलदेव खैहरा, सुखविंदर सुक्खी समेत कई नेता हैं। अकाली दल ने बसपा के विधायक को डिप्टी सीएम बनाने की घोषणा भी कर रखी है। अकाली दल की तरफ से एससी सीटों पर बसपा को सारथी बनाकर अपनी रणनीति बनाई जा रही है। अकाली दल ने बसपा को 20 सीट दे रखी है। बसपा का जनाधार लगातार गिरता जा रहा था लेकिन अकाली दल के साथ आने से बसपा वर्कर उत्साहित होने लगा है। एससी वोट पर पकड़ रखने वाली बहुजन समाज पार्टी का पंजाब में पिछले कुछ सालों से ग्राफ लगातार लुढ़का है। पंजाब में बसपा का श्रेष्ठ प्रदर्शन 1992 में हुआ था, जब उन्होंने 16.32 फीसदी मत हासिल करते हुए नौ सीटों पर कब्जा किया था।
आम आदमी पार्टी का पंजाब में कोई बड़ा एससी बिरादरी का चेहरा नहीं है, लेकिन केजरीवाल ने लगातार दौरे कर पंजाब में एससी बिरादरी को खींचने के लिए कई घोषणाएं कर रखी हैं। जिसमें प्रत्येक बच्चे को मुफ्त शिक्षा, एससी भाईचारे के बच्चे की कोचिंग की फीस पंजाब सरकार देगी, उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने वाले एससी भाईचारे के बच्चे की फीस का खर्च पंजाब सरकार करेगी। परिवार में अगर कोई भी बीमार होगा तो उसका खर्च पंजाब सरकार सहेगी। आम आदमी पार्टी के पास कोई मुख्य एससी चेहरा नहीं है। उल्टा दोआबा से चुनाव लड़ने वाले कई नेता पार्टी को अलविदा कह चुके हैं।
प्रदेश में एससी वोट के महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 5 विधानसभा क्षेत्र हैं, जहां अनुसूचित जाति कुल मतदाताओं का 30 फीसदी से अधिक हैं। बाकी 45 विधानसभा क्षेत्रों में 20 से 30 फीसदी मतदाताओं के बीच आबादी है।
इतिहास साक्षी है कि आरक्षित सीटों पर कभी अकाली दल तो कभी कांग्रेस हावी रही है। शहरों की आरक्षित सीटों पर भाजपा ने भी अपना बोलबाला बनाकर रखा है। 2017 के चुनाव में कांग्रेस ने 34 एससी-आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में से 21 पर जीत हासिल की। 2012 में 34 में से केवल 10 सीट ही जीती। यानी 2017 में कांग्रेस को 11 सीट का इजाफा एससी रिजर्व सीटों पर हुआ। 2007 व 2017 में एससी भाईचारे का अधिक मत अकाली दल भाजपा को मिला था, जिस कारण दोनों बार उनकी सरकार बनी।