जालंधर। आप की आंधी में पंजाब के रिवायती दलों की हालत खराब है। इस आंधी में धरातल पर पहुंचे रिवायती दलों का दोबारा उठना आसान नहीं हैं। चाहे पंजाब की नवगठित पंजाब लोक कांग्रेस पार्टी हो, कांग्रेस या फिर भाजपा अकाली दल सबका यही हाल है।
पंजाब में 2017 में हुए चुनाव में जनता ने कांग्रेस को सिर-आंखों पर बिठाते हुए 10 साल बाद फिर सत्ता सौंपी थी। 117 सीटों में से पार्टी को 77 सीटें मिली थीं, जबकि उसकी सबसे करीबी प्रतिद्वंदी आम आदमी पार्टी को 20 सीटें ही मिली थीं। कैप्टन के सिर जीत का सेहरा बंधा था। उन्होंने चार साल से ज्यादा समय पंजाब में कांग्रेस की सरकार चलाई। फिर एंट्री हुई नवजोत सिंह सिद्धू की। कैप्टन अमरिंदर सिंह को ये भरोसा दिया जाता रहा कि उनकी कुर्सी सुरक्षित है, लेकिन पार्टी आलाकमान के इशारे पर नवजोत सिंह सिद्धू ने अमरिंदर सिंह के खिलाफ मोर्चा खोले रखा।
अमरिंदर सिंह दिल्ली और चंडीगढ़ के बीच शक्ति संतुलन बनाते रहे और आखिर में कांग्रेस ने उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटा दिया। कैप्टन अमरिंदर ने इसे अपनी बेअदबी करार दिया और कहा कि वो कांग्रेस की जड़ों को हिला देंगे। हालांकि ठीक पांच साल बाद आंकड़े बिलकुल विपरीत हैं। अब आम आदमी पार्टी 92 सीट जीतकर सत्ता में आ चुकी है और कांग्रेस 18 सीटों पर सिमट गई है। सिद्धू ने पहले खुद पीपीसीसी की कमान संभाली, लेकिन संगठन को मजबूत करने के स्थान पर उनकी नजर पंजाब की सीएम की कुर्सी पर थी। फिर उन्होंने कैप्टन से उसकी कुर्सी छीनी और बाद में नवनियुक्त सीएम चन्नी के खिलाफ हो गए।
चन्नी ने 111 दिन जितने वादे या बिजली के बिल माफ से लेकर जनता के भलाई के कार्य किए, सिद्धू ने बयानबाजी कर चन्नी का ग्राफ पंजाब में गिरा दिया। सिद्धू के कंधों पर जिम्मेदारी संगठन को मजबूत करने की थी लेकिन, उन्होंने विपक्ष की भूमिका में रहकर कांग्रेस को ठोकने का काम किया। राणा गुरजीत सिंह से लेकर सुनील जाखड़, भारत भूषण आशू से लेकर डिप्टी सीएम सुखजिंदर सिंह रंधावा व ओपी सोनी किसी को सिद्धू ने नहीं बख्शा। आप ने इस मौके को लपकने में देरी नहीं की।
कांग्रेस का बुरी तरह से बंटाधार हो चुका है। जाखड़ अपनी डफली अलग बजा रहे हैं, सांसद मनीष तिवारी नाराज हैं। रवनीत सिंह बिट्टू से लेकर कई कांग्रेसी नाराज व हताश हैं। सिद्धू पंजाब के मुद्दों पर व भ्रष्ट अधिकारियों पर मुखर रहेंगे और पार्टी के कार्यकर्ताओं को दोबारा खड़ा करने की तैयारी का प्लान बना रहे हैं। पीपीसीसी के प्रधान नवजोत सिंह सिद्धू के सलाहकार सुरिंदर डल्ला का कहना है कि हम 2024 के चुनाव की तैयारी में लग गए हैं, पंजाब में जो मुद्दे हैं चाहे वह बेअदबी के हैं या फिर ड्रग के या फिर लूट खसोट के मामले पर आवाज उठाई जाएगी।
पंजाबी सूबा बनने के बाद अकाली दल पहली बार जमीन पर
2017 में भाजपा के साथ चुनाव लड़ने वाली शिरोमणि अकाली दल के हिस्से 25.2 फीसदी वोट और 15 सीटें आई थीं, लेकिन इस बार शिरोमणि अकाली दल का वोट प्रतिशत घटकर 18.36 फीसदी हुआ है, लेकिन सीटें सिर्फ तीन हैं। दिलचस्प बात है कि माझा मालवा व दोआबा में एक एक सीट है। पार्टी जमीन पर आ चुकी है, पार्टी सुप्रीमो सुखबीर बादल खुद चुनाव हार गए हैं। उनके पिता प्रकाश सिंह बादल, जीजा आदेश प्रताप कैरों, साला बिक्रम सिंह मजीठिया भी अपनी सीट बचा नहीं पाए हैं। साल 1920 में स्थापित हुई शिअद का प्रदर्शन इस चुनाव में इस हद तक खराब रहा कि आखिरी बार चुनाव लड़ने का दावा करने वाले प्रकाश सिंह बादल आप के उम्मीदवार खुड्डियां से चुनाव हार गए।
2012 के पंजाब चुनाव की करें तो उस वक्त अकाली दल ने 56 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। हालांकि साल 2017 के चुनाव में आम आदमी पार्टी की मौजूदगी ने उन्हें नुकसान पहुंचाया और अकाली दल सिर्फ चुनाव हारा बल्कि सीटों की संख्या भी कम हो गई। इस बार तो तीन सीट पर ही अकाली दल जीत पाया है। अकाली दल को जमीनी स्तर पर खड़ा करना काफी चुनौतीपूर्ण होगा। सुखबीर बादल के सलाहकार जंगवीर सिंह का कहना है कि अकाली दल का वोट प्रतिशत गिरा है, इस पर मंथन किया जा रहा है। अकाली दल व भाजपा के बीच लोकसभा चुनावों से पहले गठबंधन के सभी विकल्प व रास्ते खुले हैं। भाजपा भी पंजाब में अपना प्रदर्शन अच्छा नहीं कर पाई है, इसलिए उम्मीद है कि गठबंधन होने के बाद पंजाब में अकाली दल भाजपा दोबारा एक नए सिरे से उभरकर सामने आएगी।
कैप्टन अमरिंदर सिंह पार्टी को मजबूत करेंगे, भाजपा के संग मिलकर संगरूर लोकसभा उपचुनाव की तैयारी होगी
पंजाब की पटियाला अर्बन सीट से पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ताल ठोक रहे थे। आम आदमी पार्टी के अजीतपाल सिंह कोहली ने अमरिंदर सिंह को 13 हजार वोटों से मात दी है। चुनाव से पहले ही अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस छोड़ अपनी पार्टी बनाई थी और नवगठित पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस का गठबंधन भाजपा के साथ हुआ था।
साल 2021 सितंबर में कांग्रेस के साथ उनके कुछ ऐसे मतभेद हुए कि उन्होंने मुख्यमंत्री पद और दल दोनों से ही इस्तीफा दे दिया था। यह पहली बार नहीं है, जब अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस छोड़ी हो बल्कि इससे पहले उन्होंने 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के चलते कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद वह 1998 में पार्टी में वापस लौटे और साल 2002 से 2007 और 2017 से सितंबर 2021 तक पंजाब के मुख्यमंत्री रहे।
2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अमृतसर से भाजपा नेता अरुण जेतली को एक लाख से अधिक वोटों से हराया था। इसके बाद कांग्रेस ने कैप्टन को लोकसभा में पार्टी के संसदीय दल का उपनेता नियुक्त किया, लेकिन अमरिंदर का दिल पंजाब में ही लगा रहा। उनके मन को देखते हुए आलाकमान ने 2017 में फिर से उन पर दांव खेला और बाजी अपने पक्ष में कर ली। साढ़े चार साल के बाद पंजाब की सियासत ने करवट ली और कैप्टन को सीएम की कुर्सी से हाथ धोना पड़ गया।
ऐसे में कैप्टन ने अपनी सियासी राह कांग्रेस से अलग चुन ली और बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर चुनावी मैदान में उतरे। कैप्टन अमरिंदर सिंह की पार्टी पंजाब में नई है और रास्ता बहुत लंबा है। कैप्टन अमरिंदर सिंह के लिए पार्टी का संगठन खड़ा करना, उसमें जान फूंकना आसान नहीं है। पंजाब में उनका गठबंधन भाजपा के साथ होने से कैप्टन को भविष्य में उम्मीद है। कैप्टन के मीडिया सचिव विमल सुंबली का कहना है कि कैप्टन की पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस और भाजपा का गठबंधन है, जो मजबूती के साथ पंजाब के संगरूर उपचुनाव में उतरेगा।