अपने परिवार के साथ चंद्रशेखर अरोड़ा।
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चंद्रशेखर अरोड़ा उनके लिए सबक हैं, जो कहते हैं कि औलाद के रूप में बेटा जरूर होना चाहिए। अरोड़ा की दो बेटियां हैं, जिन्हें उन्होंने पूरी आजादी देकर पाला है। कभी किसी तरह की बंदिश नहीं रखी। आज दोनों बेटियां कामयाब हैं। एक सीएस है तो दूसरी जालंधर की पहली कामर्शियल महिला पायलट है। दोनों को अपने पिता पर गर्व है।
चंद्रशेखर अरोड़ा बताते हैं कि 26 साल पहले जब छोटी बेटी पैदा हुई तो रिश्तेदार-समाज और यहां तक कि महिला डॉक्टर ने भी कहा कि ‘फिर से बेटी’। इस पर चंद्रशेखर ने कहा-समय बदल चुका है। आज बेटियां किसी मायने में बेटों से कम नहीं हैं। छोटी बेटी की किलकारियों से घर गूंजा तो उसका नाम गुंजन रखा। बड़ी बेटी आशिमा थी। रिश्तेदार दबाव डालते कि बेटे के लिए कोशिश करो। मुझे उनकी सोच पर तरस आता। मैंने सोच लिया था बेटियों को खूब पढ़ाऊंगा। उनकी परवरिश करूंगा और वही छूट दूंगा जो बेटों को देते हैं।
चंद्रशेखर के मुताबिक, जब बेटियों की स्कूलिंग के लिए पैसों की जरूरत पड़ी तो उन्होंने स्क्रीन प्रिंटिंग का काम शुरू किया। गुंजन के दादा महंत आज्ञा सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्हें ताम्रपत्र भी मिला था। उनके नाम पर दुकान का नाम महंत संस रखा। बेटियों की पढ़ाई के लिए दिन रात मेहनत की, कुछ वर्ष बाद काम कम हो गया तो घर से शुरू कर दिया। बेटियों की कॉलेज की पढ़ाई शुरू हुई। छोटी बेटी का थॉपर यूनिवर्सिटी पटियाला में बी-टेक में एडमिशन कराया और लोन लेकर बेटियों को पढ़ाया। आज बड़ी बेटी आशिमा जीएनए फगवाड़ा टूल्स में कंपनी सेक्रेटरी (सीएस) है। छोटी बेटी गुंजन अरोड़ा ने 2018 में जालंधर की पहली कामर्शियल महिला पायलट बनकर नाम रोशन किया है।
पापा ने कभी नहीं कहा बेटी ये बनना है : गुंजन
जब मैं कॉलेज की पढ़ाई के लिए जालंधर से पटियाला थॉपर यूनिवर्सिटी आई और बीटेक में दाखिला लिया तो पापा ने कहा कि रोज अप-डाउन कर लिया करो। पापा रात में खाना मेरे साथ ही खाते थे, अक्सर में लेट हो जाती तो वह इंतजार करते थे। मैं पापा की बेटी हूं। मुझे कभी महसूस नहीं हुआ, समाज की रुढ़िवादी सोच से परे जो भरोसा परिवार को बेटों पर होता है, पापा का मुझ पर था। पापा ने कभी यह नहीं कहा कि बेटी ये बनना है। जब 2017 में बीटेक पूरी हुई तो मैंने कहा-कंप्यूटर पर बैठकर कारपोरेट सेक्टर में जॉब करने के बजाय उड़ना चाहती हूं। पापा ने साथ दिया और 2018 में सीपीएल में चयन हो गया, मैं सेम्यूलेटर पर 3 वर्ष प्लेन उड़ाने की ट्रेनिंग के साथ 500 घंटे फ्लाइट उड़ा चुकी हूं। कानपुर में गर्ग एविएशन में पिछले लंबे समय से ट्रेनिंग दे रही हूं। जल्द ही इंडिगो की फ्लाइट उड़ाते हुए नजर आऊंगी क्योंकि सेम्यूलेटर पर 3 वर्ष की ट्रेनिंग पूरी हो चुकी है। मेरे सपनों को साकार करने में पापा का हाथ है, जब भी पहली फ्लाइट उड़ाऊंगी उसमें मेरी फैमिली भी होगी। मैं जो बनना चाहती थी उस सपने के साक्षी मेरे अभिभावक बनेंगे तो लगेगा कि सारा जहां जीत लिया। लोग बेटों की बात करते हैं लेकिन हम पापा की बेटियां उनके लिए बेटों से कम नहीं हैं।