पंजाब की सियासत में अब तक का इतिहास रहा है कि बीजेपी जब भी कमजोर हुई है, उसका लाभ कांग्रेस को मिला है। यही वजह कि अकाली और बीजेपी के गठबंधन टूटने से कांग्रेस को अपना सियासी फायदा नजर आ रहा था।
श्री करतारपुर कॉरिडोर खोलने के अगले ही दिन श्री गुरु नानक देव जी के प्रकाशोत्सव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर सिख समाज को भावनात्मक रूप से भाजपा के साथ जोड़ने की कोशिश की है। साथ ही पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर मास्ट्रक स्ट्रोक खेल दिया है। पंजाब में साढ़े 3 महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले ये फैसला स्थानीय भाजपा की लीडरशिप के लिए ऑक्सीजन का काम करेगा।
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भाजपा के दिग्गज अब देहाती इलाकों में कमल के फूल को खिलाने के लिए मंथन व योजना बनाने में लग गए हैं। कृषि कानूनों के विरोध में भाजपा के कई दिग्गज पार्टी से किनारा कर गए थे, जिसमें पूर्व कैबिनेट मंत्री अनिल जोशी अकाली दल का दामन थाम चुके हैं। फतेहगढ़ साहिब से 11 पार्टी पदाधिकारी भाजपा को अलविदा कह गए थे। भाजपा युवा महासचिव वरिंदर सिंह, पंजाब भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश प्रधान त्रिलोचन सिंह, पार्टी के महासचिव मालविंदर सिंह कंग पार्टी छोड़ चुके हैं। अबोहर से पार्टी के चार पूर्व पार्षदों समेत कई नेताओं के इस्तीफे के बाद पार्टी का जनाधार मालवा में काफी सिमटने लगा था। मालवा में ही 69 सीट हैं, जो सत्ता की जीत हार का फैसला करती है।
हालात यह बन गए थे कि पंजाब में भाजपा के नेताओं को प्रचार तो दूर, कोई मीटिंग तक नहीं करने दी जा रही थी और पंजाब में भाजपा वर्करों का मनोबल गिरता जा रहा था। पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटें हैं इनमें से 40 शहरी, 51 सेमी अर्बन और 26 विधानसभा सीट देहात से हैं। पंजाब में भाजपा का साथ अकाली दल छोड़ चुका था, ऐसे में 117 विधानसभा हलकों में अपने उम्मीदवारों को खड़ा करना और उनका प्रचार करना काफी मुश्किल था, किसान हर मीटिंग में विरोध जता रहे थे।
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खास है पंजाब की सियासत का इतिहास
पंजाब की सियासत में अब तक का इतिहास रहा है कि बीजेपी जब भी कमजोर हुई है, उसका लाभ कांग्रेस को मिला है। यही वजह कि अकाली और बीजेपी के गठबंधन टूटने से कांग्रेस को अपना सियासी फायदा नजर आ रहा था। कांग्रेस और बीजेपी दोनों के राजनीतिक आधार हिंदू मतदाता हैं। पंजाब में 1997 के दौरान जब बीजेपी को 18 सीटें मिलीं तो प्रदेश में सरकार अकाली और बीजेपी की बनी। 2002 में बीजेपी तीन सीटों पर सिमट गई और प्रदेश में सरकार कांग्रेस की बनी। 2007 में 19 और 2012 में 12 सीटें बीजेपी को मिलीं तो प्रदेश में कांग्रेस सत्ता से दूर रही और सरकार शिअद व भाजपा गठबंधन की बनी। 2017 के विधानसभा चुनाव के नतीजे को देखें बीजेपी को महज तीन सीटें आईं और सत्ता कांग्रेस को मिली।
दरअसल, पंजाब की कुल 117 सीटों में से भाजपा अभी तक महज 23 सीटों पर चुनाव लड़ती रही है, लेकिन अकाली दल से अलग होने के बाद अब उसे पूरे राज्य में अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने का सियासी मौका मिल गया था लेकिन कृषि कानूनों के विरोध के कारण भाजपा की हालत काफी खराब हो रही थी। ऐसा नहीं कि पार्टी कभी अकाली दल से अलग नहीं होना चाहती थी। कई बार ऐसी कोशिश भाजपा की प्रदेश इकाई की तरफ से हुई, लेकिन हर बार पार्टी हाईकमान के सियासी दखल के चलते समझौते होते रहे। इसी वजह से भाजपा को पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू को खोना पड़ा।
कृषि कानून रद्द होने से अब भाजपा के पास पंजाब में एक बड़ा अवसर है कि सभी 117 सीटों पर राजनीतिक आधार बढ़ाया जा सके। पार्टी के पंजाब प्रभारी गजेंद्र सिंह शेखावत ने हाल ही में नया पंजाब भाजपा दे नाल.. नारा लगाकर यह संदेश दे दिया था कि भाजपा पंजाब के सियासी खेल में वापस आ रही है।
भाजपा की तरफ से 1984 में हुए दंगों के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बनाकर मोदी सरकार ने इसे पूरे अंजाम तक पहुंचाने, करतारपुर साहिब कॉरिडोर खोलने, 1984 से 2014 तक काली सूची में डाले पंजाबियों का नाम हटवाने, लंगर पर जीएसटी खत्म, बठिंडा में एम्स और अमृतसर में आईआईएम देने जैसे कई मामले हैं, जिनसे पार्टी पंजाब में अपना जनाधार बढ़ाने का पूरा यत्न करने की तैयारी कर रही है।
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता आरपी सिंह का कहना है कि पंजाब में 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद सरकार गठन में भाजपा की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होगी। आरपी सिंह ने कहा कि भाजपा मजबूती से पंजाब में विधान सभा चुनाव लड़ेगी और इतना तय है कि भाजपा के बिना प्रदेश में किसी की भी सरकार नहीं बनेगी। सिंह ने कहा कि पंजाब में राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदल रहा है और आने वाले एक महीने में गठबंधन के स्वरूप को अमलीजामा पहना दिया जाएगा।
सिंह ने कहा कि भाजपा किन नेताओं और दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी, यह अगले एक महीने में तय हो जाएगा। उन्होंने इस बात से इनकार नहीं किया कि आने वाले दिनों में भाजपा व कैप्टन अमरिंदर सिंह की पार्टी मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और पंजाब के प्रभारी दुष्यंत गौतम भी यह कह चुके हैं कि अमरिंदर सिंह एक राष्ट्रवादी नेता हैं और भाजपा के दरवाजे सभी राष्ट्रवादी दलों और व्यक्तियों के लिए खुले हैं हालांकि इसके साथ ही उन्होने यह भी जोड़ा था कि जब अमरिंदर सिंह अपनी नई राजनीतिक पार्टी बना लेंगे तब हमारे वरिष्ठ नेताओं के साथ बातचीत में तमाम मुद्दों पर उनसे चर्चा की जाएगी। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आरपी सिंह ने भी कहा कि कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ चुनावों से पहले गठबंधन पर विचार चर्चा जरूर होगी।