पंजाब के मालवा के दिग्गज सरदारों के लिए विधानसभा चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल ही नहीं होंगे, बल्कि इस बार के चुनाव परिणाम उनका सियासी भविष्य भी तय करेंगे। पूर्व मुख्यमंत्रियों प्रकाश सिंह बादल, कैप्टन अमरिंदर सिंह, राजिंदर कौर भट्ठल समेत सुखदेव सिंह ढींडसा और भगवंत मान के सियासी सफर की दिशा विधानसभा चुनावों पर निर्भर है।
देश के सबसे अनुभवी सियासतदान पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल व उनके बेटे सुखबीर सिंह बादल के लिए सत्ता हासिल करने की राह आसान दिखाई नहीं दे रही है। 1947 में राजनीति में कदम रखने वाले सीनियर बादल को 75 वर्षों का अनुभव है। किंतु ढींडसा समेत कई वरिष्ठ अकाली नेताओं के अलग होने का असर मालवा की कई सीटों पर साफ दिखाई दे रहा है। किसानों की नाराजगी भी पार्टी पर भारी पड़ सकती है। हालांकि बसपा से गठबंधन ने पार्टी को सहारा जरूर दिया है। सियासी जानकार मान रहे हैं कि विस चुनाव परिणाम सुखबीर बादल का सियासी भविष्य तय करेंगे।
सीना तान कर अपने ढंग से सियासत करने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह, कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी के जरिए सियासी पारी खेल रहे हैं। पूर्व पीएम राजीव गांधी के सहपाठी रहे कैप्टन ने 1980 में लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी। अस्सी के दशक में अकाली दल से नाराज होकर उन्होंने खुद की पार्टी बनाई थी, लेकिन सफल नहीं हो सके थे। बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए थे। भाजपा व ढींडसा से हाथ मिलाकर कैप्टन सत्ता की दहलीज तक पहुंचना चाहते हैं। कैप्टन की नजर कांग्रेस में नजरअंदाज होने वाले नेताओं पर है।
पूर्व सीएम राजिंदर कौर भट्ठल के लिए ये चुनाव आरपार की लड़ाई मानी जा रही है। तेज तर्रार सरदारनी के रूप में चर्चित बीबी भट्ठल, लहरागागा से पिछला विस चुनाव करीब 27 हजार मतों के अंतर से हार गईं थीं। स्वतंत्रता सेनानी हीरा सिंह भट्ठल व हरनाम कौर की बेटी बीबी भट्ठल का जन्म 1945 में लाहौर जेल में हुआ था। उनके माता पिता स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय थे। वे पंजाब की एकमात्र व पहली महिला सीएम रही हैं। इस बार के चुनाव भट्ठल के सियासी कॅरिअर के लिए अहम माने जा रहे हैं। हलके के लोगों का भरोसा जीतना उनके लिए बड़ी चुनौती है।
अकाली दल से अलग होकर अकाली दल संयुक्त बनाने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखदेव सिंह ढींडसा, मालवा की सियासत में बड़ा नाम हैं। 1972 में पहली बार विधायक बने सीनियर ढींडसा, चार विस चुनाव व एक लोकसभा जीत चुके हैं। तीन बार राज्यसभा सदस्य निर्वाचित हुए हैं। ढींडसा के बेटे परमिंदर ढींडसा पांच विस चुनाव जीत चुके हैं। इस बार का चुनाव ढींडसा परिवार का सियासी वजूद तय करेगा। भाजपा व कैप्टन से गठबंधन कर चुनाव में उतरे ढींडसा ने कई बडे़ चेहरों को चुनाव मैदान में उतारा है। ढींडसा, अकाली दल को पटखनी देकर अपना सियासी रसूख कायम रखने की कोशिश में जुटे हैं।
आम आदमी पार्टी के सीएम चेहरा भगवंत मान (सांसद) के लिए विस चुनाव अहम हैं। सांसद मान के लिए विस चुनाव का अनुभव कड़वा ही रहा है। अब तक भगवंत मान दो बार विस चुनाव लडे़ हैं और दोनों बार जलालाबाद व लहरागागा से उन्हें हार नसीब हुई। भगवंत मान के लिए केवल अपनी सीट (धूरी) के लोगों का ही नहीं बल्कि समूचे पंजाबियों का भरोसा जीतना चुनौती होगा। सांसद भगवंत मान के सीमित समागमों में लोगों का हुजूम उमड़ रहा है। क्या यह भीड़ मतदान के वक्त वोट में तबदील होगी। विस चुनाव उनकी प्रतिष्ठा का सवाल है और पार्टी के लिए सत्ता का रास्ता खोलने का दारोमदार उन्हीं के कंधों पर है।