जलियांवाला बाग में पंजाब की स्थानीय स्थापत्य शैली के अनुरूप धरोहर संबंधी विस्तृत पुनर्निर्माण कार्य किए गए हैं। बाग में चार नई गैलरियां बनाई गई हैं। एक थिएटर का निर्माण भी किया गया है। बाग में निर्मित एक गैलरी में पंजाब के इतिहास को दर्शाया गया है, जिसमें अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन की जानकारी नई पीढ़ी को मिलेगी।
दूसरी गैलरी में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किए अत्याचार और पंजाब के शूरवीरों की बहादुरी को दिखाया गया है। एक गैलरी में अंग्रेज सैनिकों द्वारा गोलियों का शिकार बनाने के किस्से दर्शाए हैं तो दूसरी में जनरल डायर और ऊधम सिंह से जुड़ी तस्वीरें हैं। शहीद भगत सिंह से जुड़े रोचक चित्र भी यहां हैं।
इसलिए हो रही है आलोचना
आरोप लग रहे हैं कि रंग-बिरंगी रोशनी और तेज संगीत के माहौल से शहीदों की मर्यादा का अपमान हो रहा है। ज्यादा एतराज बाग तक जाने वाले ऐतिहासिक संकरे रास्ते में किए गए परिवर्तन पर है। पहले इस संकरे रास्ते के दोनों सिर्फ साधारण और कोरी दीवारें थीं। अब बाग तक जाने वाले रास्ते का स्वरूप इस कदर बदल दिया गया है कि अब वह बिलकुल भी वैसा नहीं दिखता जैसा 13 अप्रैल 1919 की उस शाम को था जब जनरल डायर ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलवा दीं थी। गोलियां चलाने से पहले इस गली को ब्रिटिश सैनिकों ने बंद कर दिया था। इसी वजह से उस भयावह दिन कोई भी वहां से बाहर नहीं निकल सका।
तलाशे जा रहे हैं शहीद परिवार
सरकारी रिकॉर्ड में जलियांवाला बाग में सिर्फ 488 लोगों के शहीद होने के प्रमाण दर्ज हैं। जबकि अंग्रेजों ने दस मिनट में 1650 गोलियां चलाकर बाग में मौजूद एक हजार से ज्यादा लोगों को शहीद किया था। इन शहादत पाने वाले लोगों की पहचान के लिए राज्य सरकार ने गुरु नानकदेव यूनिवर्सिटी की रिसर्च टीम लगाई है। साथ ही शहीद ऊधम सिंह की पिस्तौल और डायरी को यूके से वापस लाए जाने की भी कोशिश जारी है।
मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह चाहते हैं कि जलियांवाला बाग के शहीदों के गांवों में यादगार बनाई जाए और उन गांवों के विकास के लिए अतिरिक्त फंड मुहैया करवाए जाए। इसके लिए उन्होंने शहीद हुए लोगों की पहचान करने के लिए एक टीम लगाई हुई है, जो आवश्यक तथ्य जुटा रही हैं।