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जलियांवाला बाग शताब्दी यादगार का किया उद्घाटन

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मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने अमृतसर के दो दिवसीय दौरे पर शनिवार को गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (जीएनडीयू) में अध्यात्मिक संत और शिक्षाविद् प्रेम सिंह मुराले वाले की चेयर का उद्घाटन किया। सीएम ने बताया कि पंजाब सरकार की ओर से इसके लिए एक करोड़ रुपये का सहयोग दिया गया है।
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सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस दौरान स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर जलियांवाला बाग शताब्दी यादगार का भी उद्घाटन किया। यह यादगार 13 अप्रैल 1919 के कत्लेआम में शहीद होने वालों की याद में स्थापित की गई है। इसका नींव पत्थर 25 जनवरी 2021 को रखा गया था। अमरिंदर सिंह ने कहा कि रंजीत एवेन्यू में अमृत आनंद पार्क में 3.5 करोड़ रुपये से 1.5 एकड़ जमीन में यह यादगार गुमनाम शहीदों की याद में बनाई गई है। मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर गुमनाम शहीदों को भी श्रद्धांजलि भेंट की और शहीदों के 29 पारिवारिक सदस्यों को सम्मानित किया। सीएम गुरु नानक स्टेडियम में तिरंगा लहराएंगे।
सीएम ने 6.10 करोड़ रुपये की लागत वाले स्कूल ऑफ एजुकेशन, 2.45 करोड़ रुपये के जनसंचार विभाग, 3.30 करोड़ रुपये के होटल मैनेजमेंट और पर्यटन का उद्घाटन किया। इसके अलावा 3.50 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले गोल्डन जुबली सेंटर फॉर इंटरप्रिन्योरशिप एंड इनोवेशन और 1.6 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली शूटिंग रेंज का भी नींव पत्थर रखा।
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कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नींव पत्थर रखने के बाद उम्मीद जताई की कि यह परियोजना गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी को देश में उच्च दर्जे की यूनिवर्सिटी में शुमार करेगी। संत प्रेम सिंह मुराले वाले को समर्पित चेयर संत शख्सियत के जीवन और दर्शन पर अनुसंधान करने के लिए विद्वानों और खोजार्थियों के लिए मददगार साबित होगी। इस चेयर द्वारा किए जाने वाला अनुसंधान यूनिवर्सिटी की पुस्तकालय ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे प्रकाशित किया जाएगा।
कैबिनेट मंत्री तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा द्वारा यूनिवर्सिटी में स्थापित होने वाली चेयर फंडों की कमी के चलते खुर्द-बुर्द होने की बात पर कैप्टन ने कहा कि इस तरह की अनुसंधान के लिए ग्रांट में वृद्धि की जाएगी। बता दें कि संत प्रेम सिंह ने 1921 में गुरु गोबिंद सिंह खालसा और लुबाना स्कूल की स्थापना की। कपूरथला के नडाला और बेगोवाल कस्बों में आज भी धार्मिक समूह कॉलेज चलाए जा रहे हैं। वे 1937 और 1945 में पंजाब विधानसभा के लिए चुने गए और गुरुद्वारा सुधार लहर में सक्रिय भूमिका निभाते हुए 1926 से 1950 तक शिरोमणि कमेटी के सदस्य भी रहे हैं।
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