मंगलवार दोपहर दो बजे सिविल सर्जन दफ्तर में अचानक दिल्ली नंबर की दो गाड़ियां आकर रुकती हैं। उनमें से करीब छह-सात लोग उतरते हैं। इससे पहले कि सिविल सर्जन दफ्तर का कोई अधिकारी कुछ समझ पाता या इनसे कुछ पूछ पाता, उससे पहले ये लोग सीधे जोनल ड्रग कंट्रोलर की तरफ बढ़ जाते हैं।
यह अधिकारी ड्रग कंट्रोलर का दरवाजा खोलकर अंदर घुस जाते हैं और एक अधिकारी ड्रग कंट्रोलर के साथ वाली कुर्सी पर बैठ कंप्यूटर स्क्रीन पर नजर टिका लेता है। इस पर ड्रग कंट्रोलर घबरा जाता है और उनसे जब पूछता तो वे अपना परिचय सीबीआई के अधिकारी के तौर पर देते हैं।
इसके बाद चंद ही मिनटों में यह बात आग की तरह सिविल सर्जन कांप्लेक्स में फैल जाती है और कई अधिकारी इधर-उधर भी हो जाते हैं। करीब एक से डेढ़ घंटे तक यह अधिकारी ड्रग कंट्रोलर दफ्तर से मैनुअल और कंप्यूटर से कुछ रिकार्ड की जांच की। इसे लेकर न तो सीबीआई अधिकारियों ने कुछ बताया और न ही ड्रग कंट्रोलर दफ्तर के लोगों ने इस संबंध में मुंह खोला। इसे लेकर जब सिविल सर्जन चरणजीत सिंह से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने फोन ही नहीं उठाया।
क्या है मामला
सूत्रों के मुताबिक करीब दो साल पहले एक महिला ड्रग इंस्पेक्टर ने दोबुर्जी क्षेत्र में कुछ एक दवा फैक्टरियों में दबिश के दौरान करीब 2.5 लाख नशीली गोलियां (ट्रामाडोल) पकड़ी थी। यह केस हाईकोर्ट में विचाराधीन है। इतनी बड़ी मात्रा में ट्रामाडोल पकड़े जाने के बाद एनडीपीएस एक्ट नहीं लगाए जाने पर हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया और मामले की जांच सीबीआई को देते हुए इसमें फिजिकल वेरिफिकेशन करने को कहा था। इसी आधार पर ही मंगलवार को सीबीआई की टीम ने जिला जोनल ड्रग कंट्रोलर दफ्तर में दबिश दी और कई रिकार्ड अपने साथ ले गए।