Holi In Varanasi: काशी में बाबा विश्वनाथ को गुलाल अर्पित करने के साथ ही काशीवासियों की होली की शुरुआत हो गई है। बुधवार को काशी की गलियों में गुलाल की बहार दिखी। रंगभरी एकादशी पर विश्वनाथ धाम परिसर में गुलाल उड़ाकर भक्तों ने पर्व को खास बनाया।
काशी की अद्भुत होली में बुधवार को गजब का नजारा देखने को मिला। सुबह से शाम तक काशीवासी गुलाल और अबीर उड़ाते हुए भोलेनाथ के गीतों पर थिरकते रहे। बाबा विश्वनाथ को गुलाल अर्पित करने के साथ ही काशिवासियों की होली की शुरुआत हो गई। शिवभक्तों ने अबीर- गुलाल उड़ाकर महादेव और मां गौरा का स्वागत किया। हर-हर महादेव के जयकारों से पूरे दिन काशी की गलियां गूंजती रहीं। तस्वीरों में देखें काशी की होली का नजारा...
सभी फोटो- उज्जवल गुप्ता
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Rangbhari Ekadashi 2024
- फोटो : उज्जवल गुप्ता
तीन पुरियों का गुलाल त्रिपुरारी के भाल लगाकर काशीवासियों ने होली खेलने की अनुमति ली। भूतभावन शिव की नगरी काशी में रंगभरी एकादशी के साथ ही होली की मस्ती शुरू हो गई। मां गौरा के साथ जब काशीपुराधिपति गलियों में निकले तो हर-हर महादेव... के साथ ही जय श्रीराम... का जयघोष भी गूंजा। बुधवार को पूर्व महंत के आवास पर एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने शिव-गौरा के गौना के ठीक पहले उनके साथ होली खेली।
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बुधवार को रामनगरी अयोध्या के कर्मकांडी ब्राह्मणों की रामभक्त मंडली और कृष्ण नगरी मथुरा कारागार के बंदियों के हाथों तैयार खास अबीर-गुलाल की बौछार के बीच गौरा ससुराल विदा हुईं। भगवान शंकर के साथ गौरी गणेश को गोद में लेकर रजत पालकी पर सवार टेढ़ीनीम स्थित पूर्व महंत के आवास से गौरा की पालकी निकली तो काशीवासियों का उल्लास अपने चरम पर था। छतों से, बारजों से काशीवासियों ने शिव-पार्वती पर अबीर-गुलाल अर्पित कर होली उत्सव मनाया। भीड़ का आलम यह था कि महंत आवास से मंदिर के बीच की 400 मीटर की दूरी तय करने में डेढ़ घंटे से अधिक का समय लग गया।
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ब्रह्म मुहूर्त से संध्या बेला तक टेढ़ीनीम स्थित पूर्व महंत के आवास पर उत्सव जैसा माहौल रहा। सुबह दस बजे से शाम पांच बजे के बीच एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने काशीपुराधिपति की चल रजत प्रतिमा का दर्शन कर गुलाल अर्पित किए। पालकी के आगे-पीछे भक्तों की भारी भीड़ शिव के स्वागत में बहुरंगी अबीर-गुलाल उड़ाती रही।
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- फोटो : उज्जवल गुप्ता
ब्रह्म मुहूर्त में शिव-गौरा का अभिषेक से गौने के अनुष्ठान आरंभ हुए। बाबा और गौरा को बंगीय देवकिरीट, खादी के राजषी वस्त्र धारण कराए गए। इन्हें धारण कराने से पूर्व पं. वाचस्पति तिवारी ने सभी वस्त्राभूषणों की विशेष पूजा की। पूरे दिन भक्त बाबा विश्वनाथ और माई महामाया को अबीर अर्पण करते रहे। चल प्रतिमाओं का दर्शन करने के लिए काफी संख्या में काशीवासी और विशिष्टजन पहुंचे।
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- फोटो : अमर उजाला
डमरुओं की गर्जना के बीच निकली राजसी सवारी
पालकी उठने का समय हो जाने के बाद भी लोग दर्शन के लिए कक्ष में प्रवेश करने के लिए भीड़ में जूझते रहे। डमरुओं की गर्जना बीच राजसी ठाट में बाबा, माता गौरा के साथ पालकी पर सवार हुए। महंत आवास के बाहर मुख्य गली से मंदिर के मुख्यद्वार के बाहर अयोध्या और मथुरा से भेजे गए खास गुलाल उड़ाए गए।
गुलाब की पंखुड़ियों से हुआ स्वागत
मंदिर से अर्चकों का दल पूर्व महंत के आवास पर पहुंचा। कपूर से आरती के बाद पं. वाचस्पति तिवारी ने दोनों हाथों से रजत मशाल दिखाकर पालकी उठाने का संकेत दिया। सदस्यों के पालकी उठाते ही चारों तरफ से अबीर-गुलाब उड़ने लगे। शंखनाद, डमरू दल और शहनाई दल के पीछे-पीछे बाबा की पालकी विश्वनाथ मंदिर की ओर बढ़ी। टेढ़ीनीम में नौ ग्रहेश्वर महादेव मंदिर से आगे बढ़ते ही विष्णु कसेरा के आवास से 21 किलो गुलाब की पंखुड़ियों की वर्षा जो शुरुआत हुई तो उसका क्रम पूरे रास्ते में जगह-जगह जारी रहा। बाबा और मां पार्वती की चल प्रतिमाएं साक्षी विनायक और ढुंढिराज विनायक होते हुए विश्वनाथ मंदिर तक गईं।