जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद का आशीर्वाद लिया।
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जब वे हमारे पास आए तो हम कुछ बोलते, उसके पहले ही उन्होंने कहा शरणागत हूं...। शरणागत के त्याग का शास्त्रों में विधान नहीं है। शरणागत की रक्षा ही धर्म है। यह सोचकर फिर हमने उनसे पुराने संदर्भ में कुछ न कहा और कुशल क्षेम पूछकर उन्हें शंकराचार्य के पास ले गए। उन्होंने शंकराचार्य से निर्देश, आदेश और आशीर्वाद मांगा।