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मास्टरजी ये छोरी ना खेल पाणे की: मुस्लिम लड़कियों को रोकने पहुंच गए थे मौलवी, सर्वखाप के गढ़ में हौसलो से संवरी बेटियों की जिंदगी

Mon, 25 Apr 2022 01:10 PM IST
Dimple Sirohi मदन बालियान, अमर उजाला ब्यूरो, मुजफ्फरनगर
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कबड्डी से बेटियों ने बनाई पहचान - फोटो : amar ujala
सर्वखाप का मुख्यालय, ऐतिहासिक चौपाल और हिंदु-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल मुजफ्फरनगर के शाह गरीब की मजार वाले सोरम की पहचान आज कबड्डी खेलने वाली बेटियों से है। यह सब हो पाया कबड्डी खिलाड़ी रहे मास्टर रामपाल सिंह की सोच से, जो किसान से कबड्डी कोच बने और आज उनसे प्रशिक्षण लेकर निकली महिला कबड्डी खिलाड़ियों का देशभर में डंका बज रहा है। 

1991 में शाहपुर में राज्य कबड्डी प्रतियोगिता को देखकर किसान रामपाल सिंह कबड्डी के प्रति समर्पित हो गए और लड़कियों को कबड्डी की कोचिंग देने लगे, यहीं से उनके नाम के साथ मास्टर जुड़ गया। वह बताते हैं कि खापों के गढ़ में यह सब आसान नहीं था, गांववाले कहते थे कि मास्टरजी ‘ये लड़कियां नहीं खेल पाएंगी।’ लेकिन आज ग्रामीण भी सहयोग कर रहे हैं। निशुल्क कबड्डी एकेडमी के लिए प्रधान करणवीर सिंह ने टंकी परिसर के खुले मैदान को इंडोर स्टेडियम में तब्दील कराया, दूसरे गांवों से आने वाली खिलाड़ियों के रहने के लिए एक खाली मकान निशुल्क दिया।
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कबड्डी से बेटियों ने बनाई पहचान - फोटो : amar ujala
मुस्लिम लड़कियों को रोकने मौलवी पहुंच गए थे मैदान में
एक बार दो मौलवी मैदान पर पहुंचे और कहा कि लड़कियों को इस तरह अभ्यास कराना गलत है। रुकैया बताती हैं कि आसपास के लोग तंज कसते थे, धार्मिक बातें भी हुई, लेकिन परिवार ने साथ दिया। सभी खिलाड़ी हमेशा एक रहीं और अपने खेल पर ध्यान दिया।

 
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कबड्डी खिलाड़ी अमरेश - फोटो : amar ujala
मुस्लिम और अनुसूचित वर्ग की बेटियों को मिलीं नौकरी
अल्पसंख्यक और मजदूर तबके की बेटियां भी खेलने पहुंचीं। 50 से अधिक बेटियों को रेलवे, सीआईएसएफ, एसएसबी और हरियाणा पुलिस में खेल कोटे से नौकरी मिली। तावली गांव की रुकैया, वहीदा, प्रतिभा, तनु चौधरी एसएसबी और डिंपल रेलवे में नौकरी कर रहीं हैं। यह कबड्डी का दम था कि मजदूर कश्मीर प्रजापति के दरवाजे तक नौकरी चलकर पहुंची और बेटी अमरेश को रेलवे से नौकरी का न्योता मिला, अमरेश ने सीआईएसएफ को चुना। बिटावदा गांव की रेडर शिवानी इस समय वह सोनीपत में चल रहे टीम इंडिया के कैंप का हिस्सा है।

 

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कबड्डी से बेटियों ने बनाई पहचान - फोटो : amar ujala
मास्टरजी, ये छोरी ना खेल पाणे की
कोच बताते हैं कि लड़कियों ने खेलना शुरू किया तो कई ग्रामीणों ने टोकना शुरू किया। कहने लगे कि मास्टरजी ये लड़कियां नहीं खेल पाएंगी। इससे लड़कियों का हौसला टूटने के बजाए और अधिक बढ़ गया और मेहनत से राज्य की टीम में जगह बनाई।
 
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कोच, रामपाल सिंह - फोटो : amar ujala
मौलवी ने कहा कि इस तरह खेलना ठीक नहीं
तावली में अभ्यास के दौरान दो मौलवी ग्राउंड पर पहुंच गए। उन्होंने कहा कि लड़कियों को इस तरह अभ्यास कराना गलत है। मुस्लिम लड़कियों ने ही धर्मगुरुओं को खेल में रुचि के अनुसार खेलने की बात कही, जिसके बाद मौलवी वापस लौट गए। गांव की कई मुस्लिम लड़कियों को नौकरी मिली।
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कबड्डी खिलाड़ी तनु - फोटो : amar ujala
तंज से घबराई नहीं और मजबूत हुई
यहां कबड्डी में प्रैक्टिस कर रहीं खिलाड़ी बताती हैं कि परिवार ने तो हमेशा सहयोग दिया, लेकिन आसपास के लोग देखकर ताने मारते थे, तंज कसते थे। लेकिन टीम की सभी खिलाड़ियों ने हमेशा उन्हें अनसुना कर अपने खेल पर फोकस किया।
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