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महाशिवरात्रि: एतिहासिक मंदिरों में श्रद्धालुओं का जमावड़ा, सभी को मुराद पूरी होने की उम्मीद

Mon, 04 Mar 2019 03:13 PM IST
विक्रांत चतुर्वेदी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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बम-बम भोले के उद्घोष से रविवार को शिवालय गूंज उठे। हरिद्वार से गंगाजल लेकर शिवालय पहुंचे कांवड़ियों ने रविवार रात्रि में हाजिरी का जल चढ़ाया वहीं सोमवार सुबह चार बजे से महाशिवरात्रि का जल चढ़ाया गया। मेरठ के काली पलटन स्थित बाबा औघड़नाथ मंदिर, बिलवेश्वर नाथ मंदिर सहित सभी शिवालयों में शिव भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। वहीं बागपत, शामली और मुजफ्फरनगर के इन प्रसिद्ध मंदिरों पर श्रद्धालु बड़ी संख्या में अपनी मुरादें पूरी करने के लिए पहुंच रहे हैं-
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बाबा औघड़नाथ मंदिर संगीनों के साए में दिखाई दिया। सुरक्षा की दृष्टि से सिविल पुलिस और सेना लगाई गई। शाम से ही हरिद्वार से गंगाजल लेकर आए कांवड़ियें मंदिर पहुंचने शुरू हो गए। मंदिर के पुजारी श्रीधर त्रिपाठी का कहना है कि अधिकतर कांवड़ियों ने हाजिरी का जल चढ़ाया है। माना जा रहा है कि महाशिवरात्रि पर एक लाख से भी अधिक शिव भक्त जलाभिषेक करेंगे। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में आने पर शिव भोले अपने भक्तों की हर मनोकामना को पूर्ण करते हैं। 

 
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रंग बिरंगी रोशनी में नहाया औघड़नाथ मंदिर
महाशिवरात्रि पर बाबा औघड़नाथ मंदिर रंग बिरंगी लाइटों से जगमग हो गया। रविवार शाम को ही मंदिर में चप्पे-चप्पे पर कैमरे की नजर रही। मंदिर समिति के अध्यक्ष डॉ. महेश बंसल, सतीश सिंहल, अतुल अग्रवाल ने बताया कि समिति के सभी सदस्य शिव भक्तों की सेवा में जुटे हैं। जहां खोया पाया केंद्र बनाया गया है वहीं स्वास्थ्य चिकित्सा कैंप और जूता कैंप भी बनाए गए हैं। 
 

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पुरा महादेव की दूर दूर तक है मान्यता
बागपत में पुरा महादेव का प्राचीन नाम परशुरामेश्वर महादेव था। तब महर्षि वाल्मीकि ने परशुराम की प्रार्थना पर हरिद्वार से ले जाए गए पाषाण को शिवलिंग के रूप में स्थापित कर प्राण प्रतिष्ठा कराई। यहां दूर दूर से श्रद्धालु शिवलिंग पर जल चढ़ाने आते हैं। माना जाता है कि पुरा महादेव मंदिर में कदम रखने मात्र से ही सभी कष्ट दूरी हो जाते हैं।
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शिव उपासकों का नगर रहा है बिजनौर  
बिजनौर भगवान शिव के उपासकों की भूमि है। यहां पुराने मंदिर भगवान शंकर के ही हैं। बिजनौर रामगंगा और पहाड़ों के बीच बसा क्षेत्र प्राचीन काल में आम लोगों से अछूता था। सामाजिक गतिविधियों से दूर यह साधु-संतों की तपस्थलि थी। कण्वाश्रम यहां का प्रसिद्ध आश्रम था। यहीं राजा दुष्यंत को शकुंतला मिली थी। यहीं इनका गंधर्व विवाह हुआ था। सैंधवार महाभारत काल के गुरु द्रोणाचार्य का सैन्य प्रशिक्षण केंद्र था। विदुर कुटी महात्मा विदुर की भूमि है। यहीं भगवान कृष्ण ने एक बार महाभारत काल में भोजन किया था। 
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कंधों पर शिवलिंग लेकर चलते थे पुजारी
जिला गजिटियर कहता है कि बिजनौर भार शैव की भूमि रही है। ये भार शैव भगवान शंकर के पुजारी थे। ये अपने कंधे पर शिवलिंग लेकर चलते थे।यहां के शिव मंदिर के शिवलिंग भी प्राचीन और अलग तरह के हैं। साहनपुर के मोटामहादेव का शिव लिंग भी अलग है। गंज के घाट पर स्थित निगमागम महाविद्यालय का शिवालय बहुत पुराना है। शिव लिंग काफी ऊंचा है। मंदिर के अंदरूनी भाग में परिक्रमा का घेरा भी बना है। मंदिर के अंदर विभिन्न धार्मिक चित्र बने हैं। माना जाता है कि ये चित्र मुगलकालीन कला के हैं।
 
इसी प्रकार का शिवालय  शेरकोट का भी है। इसमें भी परिक्रमा की व्यवस्था है। नांगल सोती के शिव मंदिर में तो शिवलिंग तीनमुखी है। उसमें मुख की आकृति बनी हुई। यहीं का गंगाघाट जाने वाले गंगा मंदिर की प्राचीनतम इसी से पता चलती है कि लगातार जल प्रवाह के कारण  शिव लिंग में काफी बड़ा छेद हो गया है।  
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चांदपुर का शिवालय तो महाभारत काल का बताया जाता है। गंज पहले जल यातायात का केंद्र था। यहां के घाट पर कई प्राचीन मंदिर हैं। पहले बिजनौर से सदुपुरा, जलालपुर होकर मेरठ जाने का रास्त था। नाव से गंगा पार जाते थे। वहां भी एक पुराना शिव मंदिर है। कहा जाता है कि यात्री यहां विश्राम करते और पूजा-अर्चन कर आगे जाते थे। खारी का झारखंडी मंदिर भी प्राचीन बताया जाता है।

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400 वर्ष पुरानी है मंदिर:  लाला कृष्ण स्वरूप
गंज दारानगर केवलनंद निगमाश्रम के अंदर स्थापित प्राचीन शिव मंदिर के विषय में 95 वर्षीय गंज निवासी लाला कृष्ण स्वरूप ने बताया कि यह मंदिर राजा के ताजपुर स्टेट के राजाओं ने बनवाया था। यह मंदिर 1600 ईसवी लगभग 400 वर्ष पुराना है। इस मंदिर के अंदर की नक्काशी द्वारा तरासी गई तस्वीरें  फूल, पत्ती व मानव आकृति को आगरा के ताजमहल बनाने वाले कारीगरों के पूर्वजों द्वारा निर्मित है। वहीं गंगा घाट पर बने मंदिर लगभग 200 वर्ष पुराने है। इनका निर्माण 93 वर्षीय वयोवृद्ध सत्येंद्र शरण गुप्ता के पूर्वज तुलसीराम, हृदय राम जी के द्वारा किया गया था।

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प्राचीन शिव मंदिर है आस्था का केंद्र 
बिजनौर के शेरकोट का प्राचीन शिव मंदिर शिव भक्तों के लिए आस्था का केंद्र है। यहां हर साल बड़ी संख्या में शिवभक्त हरिद्वार से गंगाजल लाकर चढ़ाते हैं और घर परिवार की सुख समृद्धि की कामना करते है। बताया जाता है कि यह प्राचीन मंदिर करीब तीन सौ साल पुराना है। मंदिर से जुड़ी यह मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु मन से मंदिर में प्रसाद चढ़ाता है, भगवान शिव उनकी मनोकामना को पूरा करते है। इस मंदिर में महाशिवरात्रि के मौके पर प्रदेश के ही नहीं बल्कि दूसरे प्रदेश के भी श्रद्धालु मंदिर में आकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।

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महाशिवरात्रि आज, जलाभिषेक को सजे शिवालय  
मुजफ्फरनगर में जलाभिषेक के लिए शिवालयों को सजा दिया गया है। नगर का प्रमुख शिव चौक मंदिर रोशनी से जगमग हो रहा। रात्रि 12 बजे से शिव चौक पर स्थित शिव मंदिर में जलाभिषेक शुरू हो गया। उधर, दिनभर शिव भक्तों कांवड़ियों का नगर से गुजरने का सिलसिला जारी रहा। श्रावण माह की शिवरात्रि पर इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में कांवड़ आती हैं। यहां स्थित शिवलिंग पर जल चढ़ाने भक्तों की सभी मुरादें पूरी होती हैं।

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शिव चौक के अलावा नगर के सभी मंदिरों में सजावट की गई है। रात में मंदिर जगमग हो उठे। रात्रि 12 बजे से जलाभिषेक शुरू हुआ। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखकर भगवान शिव को जल अर्पण कर आराधना करते हैं। 
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यहां भी भोले को प्रसन्न करते हैं लोग 
मीरापुर में संभलहेड़ा के प्रसिद्ध पंचमुखी महादेव के पंडित अंकज शर्मा ने बताया कि सोमवार को प्रात: चार बजे से महाशिवरात्रि का जलाभिषेक शुरू हो गया। कस्बे के पंचायती मंदिर, माता काली मंदिर, कच्चा पक्का शिव मंदिर, भैरोजी शिव मंदिर, श्री शीतला माता मंदिर, जामनवाली शिव मंदिर, भूमिया शिव मंदिर, सैनी शिव मंदिर तथा रामराज के फिरोजपुर शिवमंदिर में जलाभिषेक कर श्रद्धालु भोले को प्रसन्न करने में लगे हुए हैं।

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