बीहड़ के अनेठा, जाहरपुरा, अजीत की गढ़िया, विडोरी, पहलन, पथर्रा, भरेह, हरौली, धर्मपुरा, कांयछी, सिंडोस, चौरेला, खोडन, कुर्छा, पसिया, सदूपुरा, बदनपुरा, टिटावली आदि सैकड़ों गांवों के ग्रामीणों पर हमेशा डर का साया रहता था। डाकू लालाराम, श्रीराम, मलखान सिंह, राम आसरे तिवारी उर्फ फक्कड़, निर्भय गुर्जर, सलीम गुर्जर, अरविंद गुर्जर, जगजीवन परिहार का खौफ यहां के लोगों के सिर चढ़कर बोलता था। किसी की मजाल नहीं थी कि इनके आदेश की कोई नाफरमानी कर दे।
डकैतों की बिना मर्जी के कोई भी व्यक्ति साहस नहीं जुटा पाता था कि मैं मतदान करूं या ना करूं। चंबल बीहड़ी बाशिंदे डाकुओं की बिना मर्जी के चुनाव लड़ने का साहस या वोट डालने की जुर्रत नहीं करते थे। कैलाश नारायण मिश्रा, भगत सिंह गुर्जर आदि बताते हैं कि अपने-अपने इलाकों में डाकू मतदान की रात फरमान जारी करते थे।
वे बताते हैं कि डाकुओं के फरमान जारी होने का हम लोगों को इंतजार रहता था कि वोट कहां करना है। दरवाजे पर वोट मांगने आने वालों को हम लोग कोई तवज्जो नहीं देते थे। किसी भी पार्टी का कोई भी कितना भी नजदीकी व्यक्ति क्यों ना हो, डाकुओं की बिना मर्जी के हम लोग वोट नहीं डाल पाते थे। अगर हमारे क्षेत्र का प्रत्याशी हार गया तो क्षेत्रीय लोगों को डाकुओं का कहर झेलना पड़ता था जिसके चलते गांव डाकू हत्या से लेकर कई घटनाओं को अंजाम दिया करते थे।