नवरात्र में कन्या पूजन का विशेष महत्व है। यदि कोई सच्चे मन से देवी मां की आराधना करते हुए कन्याओं का पूजन करता है तो उसकी सभी मनोकामनाएं बहुत जल्द पूरी होती हैं। जिस तरह बिना कलश पूजन के नवरात्र के सभी व्रत और अनुष्ठान अधूरे हैं उसी प्रकार कन्या पूजन करना आवश्यक है । कम ही लोगों को कन्या पूजन की सही विधि, कन्या पूजन के लाभ व इससे जुड़ी विशेष बातें पता होती हैं। ज्योतिषाचार्य डॉ. नरेंद्र दीक्षित बता रहे हैं कि कन्या पूजन के दौरान किन सावधानियों को बरतना चाहिए जिससे धन-धान्य की प्राप्ति हो...
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कन्या पूजन से प्रसन्न होती देवी मां
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कन्या पूजन
मान्यता है कि जप और दान से देवी इतनी प्रसन्न नहीं होती, जितनी कन्या पूजन से।
- एक कन्या की पूजा से ऐश्वर्य
- दो की पूजा से भोग और मोक्ष
- तीन की अर्चना से धर्म, अर्थ व काम
- चार की पूजा से राज्यपद
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कन्या पूजन
- पांच की पूजा से विद्या
- छ: की पूजा से छ: प्रकार की सिद्धि
- सात की पूजा से राज्य
- आठ की पूजा से संपदा
- नौ की पूजा से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति
यह है मान्यता
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कन्या पूजन
माता के भक्त पंडित श्रीधर के कोई संतान नहीं थी। उन्होंने नवरात्र के बाद नौ कन्याओं को पूजन के लिए घर पर बुलवाया। मां दुर्गा उन्हीं कन्याओं के बीच बालरूप धारण कर बैठ गई। बालरूप में आईं मां श्रीधर से बोली सभी को भंडारे का निमंत्रण दे दो। श्रीधर से बालरूप कन्या की बात मानकर आस-पास के गांवों में भंडारे का निमंत्रण दे दिया। इसके बाद उन्हें संतान सुख मिला।
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नवरात्रि में तीन प्रकार से कन्या पूजन का विधान
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कन्या पूजन
प्रथम प्रकार- प्रतिदिन एक कन्या का पूजन अर्थात नौ दिनों में नौ कन्याओं का पूजन करें। इस पूजन को करने से कल्याण और सौभाग्य प्राप्ति होती है | दूसरा प्रकार- प्रतिदिन दिवस के अनुसार संख्या अर्थात प्रथम दिन एक, द्वितीय दिन दो, तीसरे दिन तीन कन्याअों का पूजन करें। इस प्रकार कन्या पूजन से 45 कन्याअों का पूजन होगा। जिससे सुख व ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है | तीसरा प्रकार – नौ कन्या का नौ दिनों तक पूजन अर्थात नौ दिनों में 81 कन्याओं का पूजन। इस प्रकार से पूजन से पद, प्रतिष्ठा और भूमि की प्राप्ति होती है |
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कन्या पूजन का फल
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कन्या पूजन
- एक वर्ष की कन्या का पूजन नहीं करना चाहिए
- दो वर्ष की कन्या पूजन से दुःख-दरिद्रता और शत्रु नाश
- तीन वर्ष की कन्या पूजन से धर्म-काम की प्राप्ति, आयु वृद्धि
- चार वर्ष की कन्या पूजन से धन-धान्य और सुखों की वृद्धि
- पांच वर्ष की कन्या पूजन से आरोग्यता-सम्मान प्राप्ति
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कन्या पूजन
- छह वर्ष की कन्या पूजन से विद्या व प्रतियोगिता में सफलता
- सात वर्ष की कन्या पूजन से मुकदमा और शत्रु पर विजय
- आठ वर्ष की कन्या पूजन से राज्य व राजकीय सुख प्राप्ति
- नौ वर्ष की कन्या पूजन से शत्रुओं पर विजय, दुर्भाग्य नाश
- दस वर्ष की कन्या पूजन से सौभाग्य और मनोकामना पूर्ति
किस दिन करें कन्या पूजन
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कन्या पूजन
नवरात्रि में लोग सप्तमी से कन्या पूजन शुरू कर देते हैं लेकिन जो लोग पूरे नौ दिन का व्रत करते हैं वह तिथि के अनुसार अथवा नवमी और दशमी को कन्या पूजन करके ही व्रत का पारण करते हैं। शास्त्रों के अनुसार कन्या पूजन के लिए दुर्गाष्टमी के दिन को सबसे महत्वपूर्ण और शुभ माना गया है।
कन्या पूजन की विधि
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कन्या पूजन
- स्नान करने के पश्चात् कन्याओं के लिए भोजन अर्थात पूरी, हलवा, खीर, चने आदि को तैयार कर लेना चाहिए ।
- कन्याओं के पूजन के साथ बटुक पूजन का भी महत्त्व है, दो बालकों को भी साथ में पूजना चाहिए। एक गणेश जी के निमित्य और दूसरे बटुक भैरो के निमित्य कहीं कहीं पर तीन बटुकों का भी पूजन लोग करते हैं और तीसरा स्वरुप हनुमान जी का मानते हैं |
- कन्या पूजन बिना बटुक पूजन के अधूरी होती है |
- कन्याओं को माता का स्वरुप समझ कर पूरी भक्ति-भाव से कन्याओं के हाथ पैर धुला कर उनको साफ़ सुथरे स्थान पर बैठाएं |
- सभी कन्याओं के मस्तक पर तिलक लगाएं, लाल पुष्प चढ़ाएं, माला पहनाएं, चुनरी अर्पित करें उसके बाद ही भोजन कराएं |
- भोजन में मीठा अवश्य हो, इस बात का ध्यान रखें।
- भोजन के बाद कन्याओं के विधिवत कुंकुम से तिलक करें तथा दक्षिणा देकर हाथ में पुष्प लेकर यह प्रार्थना करें।
- वह पुष्प कुमारी के चरणों में अर्पण कर उन्हें ससम्मान विदा करें।