डॉ. एसके कटियार को मिला लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड
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वरिष्ठ चेस्ट फिजीशियन व कानपुर के मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. एसके कटियार को नेशनल कॉलेज आफ चेस्ट फिजीशियन (इंडिया) ने प्रोफेसर एमएम सिंह मेेमोरियल लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया है। यह अवार्ड उन्हें अहमदाबाद में आयोजित नेपकॉन-2018 में दिया गया।
आईएमए, परेड में एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एसके कटियार ने पत्रकारों को बताया कि चेस्ट फिजीशियन की देश की सबसे बड़ी एसोसिएशन नेशनल कॉलेज आफ चेस्ट फिजीशियन की तरफ से 29 नवंबर से 2 दिसंबर तक अहमदाबाद में नेपकॉन-2018 आयोजित की गई। इसमें उन्हें यह सम्मान दिया गया। इससे पहले उन्हें ट्यूबरक्लोसिस एसोसिएशन आफ इंडिया का गोल्ड मेडल, यूपी टीबी एसोसिएशन का गोल्ड मेडल, एनसीसीपी प्रोफेसर रमन विश्वनाथन ओरेशन अवार्ड, इंडियन कॉलेज आफ एलर्जी अस्थमा एवं एप्लाइड इम्यूनोलॉजी का डॉ. डीएन शिवपुरी अवार्ड, रमन विश्वनाथन वीपीसीआई अवार्ड, प्रोफेसर सीके मोहंती अवॉर्ड आदि मिल चुके हैं।
नेशनल कॉलेज आफ चेस्ट फिजीशियन देश के चेस्ट स्पेशलिस्ट की सबसे बड़ी व पुरानी संस्था है। यह संस्था हर साल नेपकॉन आयोजित करती है। इस बार इस आयोजन में देश- विदेश के 3000 से ज्यादा चेस्ट फिजीशियन शामिल हुए। आईएमए अध्यक्ष डॉ. अर्चना भदौरिया ने इसे आईएमए और शहर के लिए उपलब्धि बताया। पूर्व अध्यक्ष डॉ. एसी अग्रवाल ने डॉ. कटियार की तरफ से मरीजों और चेस्ट फिजीशियन की संस्था में किए गए विशेष कार्यों की जानकारी दी।
मेडिकल कॉलेज
प्रोफाइल डॉ. एसके कटियार
1969 में एमबीबीएस,1972 में मेडिकल कालेज से डिप्लोमा इन टीबी एंड चेस्ट, 1974 में मेडिकल कालेज से एमडी टीबी एंड चेस्ट
1975 में इसी मेडिकल कालेज से संबद्ध मुरारी लाल चेस्ट अस्पताल में लेक्चरर बने
1990 में इसी विभाग में प्रोफेसर बने
1992 में मेडिकल कालेज के टीबी एंड चेस्ट विभाग के विभागाध्यक्ष बने
1996 में आईएमए अध्यक्ष बने
2003 में जीएसवीएम मेडिकल कालेज के प्राचार्य बने
2003 में नेशनल कालेज आफ चेस्ट फिजीशियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने
2007 में ट्यूबरक्लोसिस एसोसिएशन आफ इंडिया के अध्यक्ष बने
2008 में सेवानिवृत हुए
2009 में ट्यूबरक्लोसिस एसोसिएशन आफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे
शोधकार्य
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त डॉ. एसके कटियार ने बताया कि उनके 100 से ज्यादा शोध प्रकाशित हुए। इनमें 2008 में एमडीआर टीबी पर किया गया शोध ‘हाईडोज आफ आइसोनियाजिट’ जर्नल आफ इंटरनेशनल यूनियन अगेंस्ट ट्यूबरक्लोसिस एंड लंग्स डिसीज में प्रकाशित हुआ। यह एमडीआर टीबी के इलाज से संबंधित था। डब्लूएचओ ने एमडीआर टीबी के इलाज की पहली बार गाइडलाइन बनाते समय इसे शामिल किया। इससे पहले 2005 में उन्होंने टीबी के गंभीर मरीजों को श्वांस नली के जरिए दवाएं देने के शोध का प्रजेंटेशन पेरिस में किया था।
मेडिकल कॉलेज
धर्मार्थ कार्य
डॉ. कटियार ने रोटरी क्लब के सहयोग से मोबाइल टीबी वैन बनवाई। इसमें एक्सरे, पैथालॉजी, जनरेटर लगे थे। यह वैन गांव - गांव जाती थी। प्रत्येक गांव में हर घर में टीबी के संदिग्ध रोगी चिन्हित करती थी। उन्हें वैन में लाकर जांच करती थी। टीबी की पुष्टि होने पर वहीं इलाज शुरू कर दिया जाता था। फिर हर 15 दिन में उनके घर के पास मरीज को दवाएं उपलब्ध कराई जाती थीं। यह अभियान 1990 से 2000 तक चला।
अस्थमा रोगी चिन्हित किए
इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च के माध्यम से डॉ. कटियार ने नगर को शहरी, अर्धशहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बांटकर सर्वे किया। उस समय उन्होंने 2.5 एमएम के डस्ट पार्टिकल की हवा में उपलब्धता की जांच और इससे हो रहे अस्थमा पर शोध किया था। डॉ. कटियार के अनुसार उस समय शहरी क्षेत्र में 2 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्र में 1.5 लोग अस्थमा पीड़ित मिले थे।