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आदमखोर हुए गुलदार: गर्दन बची तो ठीक, नहीं तो मौत पक्की, पांच दिन बाद फिर करेगा शिकार

Thu, 03 Aug 2023 11:21 AM IST
Dimple Sirohi रजनीश त्यागी, अमर उजाला, बिजनौर
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गुलदार के हमले, गुलदार न्यूज - फोटो : अमर उजाला
बिजनौर जिले में गुलदार के आतंक से लोग दहशत में जी रहे हैं। गुलदार पिछले सात माह में 13 लोगों की जान ले चुके हैं। अलग-अलग जगहों पर यह हमले हुए, जिससे यह तो तय माना जा रहा है कि कई गुलदार हमलावर हो चुके हैं। इन सभी में एक तथ्य एक जैसा ही मिला, वो था सभी पर पहला वार गर्दन पर हुआ। सभी इंसानों को गुलदार ने गर्दन से दबोचा। सांस की नली को ब्लॉक होने और गले की नसें क्षतिग्रस्त होने से एक ही झटके में सांस रुक गई। ऐसे में वन्य जीव विशेषज्ञों की मानना है यदि किसी तरह गर्दन बच जाए तो गुलदार के हमले में जान जाने का जोखिम भी 50 प्रतिशत तक कम हो जाएगा। 

यूं तो जिले में बाघ और गुलदार के नरभक्षी बनने का इतिहास काफी पुराना हो चला है। एक या दो जान तो पहले भी जाती रही हैं, लेकिन बड़ी संख्या में मौत का सिलसिला 2012-13 से शुरू हुआ था। अमानगढ़ के आसपास एक बाघिन ने दस से ज्यादा लोगों की जान ली थी। इसके बाद मंडावर-चंदक क्षेत्र में वर्ष 2019-20 में एक गुलदार नरभक्षी हुआ तो उसने पांच से ज्यादा लोगों की जान ले ली।
 
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गुलदार के हमले, गुलदार न्यूज - फोटो : अमर उजाला
अब इसी साल केवल सात माह में रेहड़ और नगीना क्षेत्र में अगल-अलग गुलदार 13 इंसानों को मार चुके हैं। 20 से ज्यादा लोग अब तक घायल हो चुके हैं, जो किसी तरह उसके हमले में बच गए। इन सब घटनाओं में एक तथ्य केवल एक जैसा है, वो है पहला हमला इंसानों की गर्दन पर होना। 

जी हां अब तक नरभक्षी गुलदार और बाघ का शिकार हुए लोगों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण शॉक एंड हेमरेज आया और उनकी जान गर्दन की नसें और सांस नली बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने से गई। यह बात अलग है कि मरने के बाद कई इंसानों का इन जानवरों ने मांस भी खाया।
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गुलदार के हमले, गुलदार न्यूज - फोटो : अमर उजाला
मजबूत जबड़े और दांत भेद देते हैं सांस की नली
विशेषज्ञों के मुताबिक गुलदार के जबड़े बहुत मजबूत होते हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह जानवर अपने से ढ़ाई गुना वजन को जबड़े में दबाकर पेड़ पर चढ़ जाता है। यह अपने शिकार को पेड़ पर बैठकर भी खाता है।

ऐसे में जब यह किसी की गर्दन पकड़ता है तो उसके नुकीले और लंबे दांत नसों को क्षतिग्रस्त करते हुए सांस नली को भेद देते हैं। इससे इंसान की मौत या तो उसी समय हो जाती है, नहीं तो वह पैरालाइज हो जाता है। जिससे वह अपना बचाव नहीं कर पाता, फिर उसे खींचकर ले जाना गुलदार के लिए आसान हो जाता है।

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गुलदार - फोटो : अमर उजाला
पांच दिन बाद फिर करेगा शिकार
नरभक्षी गुलदार का व्यवहार इंसानी खून और मांस चखने के बाद सामान्य से ज्यादा बदल जाता है। जहां सामान्य गुलदार इंसानों से डरते हैं, वहीं नरभक्षी गुलदार इंसानों को भोजन के तौर पर देखने लगते हैं। नरभक्षी होने के बाद इनके व्यवहार में आया परिवर्तन ही इन्हें पकड़ने में सबसे बड़ी बाधा बन जाता है।

विशेषज्ञों की मानें तो शिकार को मारकर खा ले तो वह अपना ठिकाना बदल देता है। साथ ही दस से 15 किलोमीटर की दूरी तक वह घूमता है। सिकंदरपुर की घटना के बाद अब विशेषज्ञ आशंका जता रहे हैं कि आठ किलोमीटर के दायरे में चार से पांच दिन के भीतर वह अपना अगला शिकार कर सकता है। 
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गुलदार। - फोटो : अमर उजाला
भले ही नरभक्षी की तलाश में तमाम विशेषज्ञ और वन विभाग की टीम लगी है, लेकिन गुलदार का बदलता व्यवहार उसे तलाशने में सबसे बड़ी बाधा बन गया है। जिम कार्बेट के रिसर्च स्कॉलर और वन्य जीव व्यवहार के विशेषज्ञ जोएल लायल कहते हैं कि गुलदार को समय मिले तो वह सात से आठ किलोग्राम तक मांस खा जाता है।

ऐसी स्थिति में वह पांच दिन तक बिना शिकार के भी रह सकता है और इस दौरान अपने छिपने की जगह तलाशता है। उसका व्यवहार बदल जाता है, जहां सामान्य तौर पर वह इंसानों से डरता है तो नरभक्षी होने के बाद उन्हें भोजन मानने लगता है। उसकी यही फितरत इंसानों के लिए खतरा बन जाती है। अगले पांच दिन में फिर से भूख लगने पर दस किलोमीटर के दायरे में पड़ने वाले गांव में वह अगला शिकार कर सकता है।
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गुलदार - फोटो : अमर उजाला
गर्दन में गमछा या नेकबेंड बचा सकता है जान
वन विभाग के एसडीओ ज्ञान सिंह कहते हैं कि हमने गुलदार प्रभावित क्षेत्रों के ग्रामीणों को जंगल जाते समय गले में गमछा या नेकबेंड लगाकर जाने को कहा है। साथ ही अपनी टीम को भी नेकबेंड और हेलमेट उपलब्ध कराए हैं। ताकि गुलदार के गर्दन पर हमले से बचाया जा सके। यह बात सही है कि गुलदार पहला हमला गर्दन पर ही करता है।
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हथिनियों को लेकर गुलदार की तलाश करती टीम - फोटो : Amar Ujala
हमले से बचने के लिए बताए सात सूत्र
भूल कर भी खुले में न जाएं शौच :  शौचालय बनवाएं और उसका इस्तेमान करें। 
निरंतर निगरानी, टिकाऊ समाधान : युवाओं के निगरानी समूह का गठन कर देर शाम तक करें गश्त। 
नशे में हैं तो घर के अंदर रहें : इस हाल में हिंसक जीव आपकाे बहुत आसानी से शिकार बना सकता है। 
दूरी बनाकर जिंदगी बचाएं : बाघ, तेंदुए, हाथी के पास न जाएं, न ही उनके द्वारा किए गए शिकार के पास। 
बच्चे आपके धरोहर हैं, उन्हें सुरक्षित रखें : बच्चों को कभी भी, कहीं भी न छोड़ें अकेला, चाहे वह आपके घर का आंगन ही क्यों न हो। 
गन्ने के खेत होते हैं हिंसक जीवों के आश्रय : समूह में करें गन्ने की कटाई और शोर-गुल एवं गाने बजाते हुए करें खेतों में प्रवेश। 
हिंसक जानवरों के छुपकर हमले का रखें ध्यान : घर के आसपास सफाई एवं रात में रोशनी का प्रबंध करें। बगैर टॉर्च रात को बाहर न जाएं।
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