अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद पांचजन्य पत्रिका ने मुलायम सिंह यादव को ‘मौलाना मुलायम’ की पदवी से नवाजा था। यह सियासी सच्चाई भी है कि इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश में तेजी से मुस्लिम ध्रुवीकरण हुआ, जिसका फायदा भाजपा और सपा दोनों ने उठाया। लेकिन इस घटनाक्रम के आगे भी कुछ है, जिसकी बदौलत मुलायम सिंह मुस्लिमों के राजनीतिक पैरोकार बने। सपा अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. यासीन अली उस्मानी का कहना है कि सिर्फ एक घटना की बदौलत लंबे समय तक कोई कौम किसी के पीछे नहीं खड़ी रह सकती। मुलायम सिंह ने अपनी पूरी राजनीति में मुसलमानों को तरजीह दी। उर्दू टीचर, उर्दू अनुवादक रखने का मामला हो या अन्य नौकरियों में मुसलमानों की भर्ती का मसला रहा हो। राजनीतिक भागीदारी में भी उन्होंने मुसलमानों का ख्याल रखा। खूब टिकट बांटे। मंत्री बनाए। मैं खुद राजनीति में नहीं आना चाहता था।
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मुलायम सिंह यादव (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
नेता जी ने बदायूं में एक बार मेरी स्पीच सुनी तो मुझे राजनीति में आने को प्रेरित किया। बाद में उर्दू एकेडमी का अध्यक्ष बनाया। नेता जी का मानना था कि जिससे वोट लिया जाए, उसे कुछ वापस भी किया जाए। बरेली कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. सोमेश यादव का कहना है कि इसमें कोई दो राय नहीं कि अयोध्या की घटना के बाद मुलायम सिंह के पक्ष में मुस्लिम ध्रुवीकरण हुआ। लेकिन उनकी सेक्युलर राजनीति का पक्ष काफी मजबूत रहा है।
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मुलायम सिंह यादव (फाइल फोटो)
- फोटो : Social Media
एसएस कॉलेज शाहजहांपुर के पूर्व प्राचार्य डॉ. अवनीश मिश्रा मुलायम सिंह को सामाजिक समरसता का आक्रामक लीडर बताते हैं। कहते हैं कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान उनका बयान ‘मेरे जीते जी अयोध्या में कोई नुकसान नहीं हो सकता’ मुसलमानों को काफी अपील किया। लंबे समय तक मुसलमानों को जोड़े रखना, उनका राजनीतिक कौशल था।
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मुलायम सिंह यादव (फाइल फोटो)
- फोटो : Instagram
शाहजहांपुर के ही जीएफ कॉलेज के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर सैयद मो. नोमान का कहना है कि नब्बे के दशक में मुसलमानों का कांग्रेस से मोहभंग हो चुका था। वे वंचित महसूस करने लगे। इसी दौरान मुलायम सिंह यादव एक नया चेहरा बनकर उभरे, जिसे मुसलमानों ने अपना हमदर्द माना। इलाहाबाद विवि में छात्र नेता रहे अजीत यादव इन दिनों बदायूं में राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं।
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मुलायम सिंह यादव (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
अजीत कहते हैं कि वीपी सिंह के नेतृत्व में जिस राजनीतिक मोर्चे का गठन हुआ, उसमें मुलायम सिंह, लालू यादव, शरद यादव प्रमुख नेता रहे। अयोध्या को लेकर भाजपाई राजनीति के विरोध में यूपी में मुलायम सिंह काफी मुखर नेता के रूप में उभरे। बाद के दिनों में जब मोर्चा टूटा तो मुस्लिम वोट सपा में शिफ्ट हुआ।
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मुलायम सिंह यादव (फाइल फोटो)
- फोटो : amar ujala
बरेली में नेता जी के पुराने साथी और कई वर्षों तक सपा महानगर अध्यक्ष रहे कदीर अहमद बताते हैं कि मुलायम सिंह के राजनीतिक उभार को मंदिर-मस्जिद से
जोड़कर देखना नाइंसाफी होगी। वे हमेशा अल्पसंख्यकों संवैधानिक अधिकार को लेकर चिंतित रहे।
सबके थे नेता जी
प्रख्यात शायर वसीम बरेलवी का कहना है कि राजनीति से इतर मुलायम सिंह यादव कलमकारों और कला प्रेमियों को विशेष महत्व देते थे। यश भारती जैसा बड़ा
सम्मान उन्होंने ही शुरू किया। उन्हें याद नहीं आता कि किसी एक व्यक्ति ने पैदल और साइकिल पर चलकर इतनी बड़ी पार्टी खड़ी की हो।