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करछना के मझुआ निवासी रामशिरोमणि मुंबई में रहकर सिक्योरिटी गार्ड का काम करते थे। गांव लौटे तो मनरेगा के अलावा कोई रोजगार ढूंढे नहीं मिल रहा है। वहीं इसौटी निवासी रोशन लाल सूरत में साड़ी मिल में काम करते थे।
लॉकडाउन हुआ तो नौकरी चली गई। गांव आने पर उनके हुनर के मुताबिक कोई काम नहीं है। इसी प्रकार इसौटा निवासी अगम लाल पुणे में रहकर ऑटो चलाता था, लेकिन गांव में रोजगार का कोई साधन ही नहीं है। इसी गांव का उमेश कुमार दिल्ली में रहकर शापिंग माल में काम करता था, लेकिन लॉकडाउन होने के कारण नौकरी छूट गयी। गांव में कोई काम नहीं मिल रहा, जिससे उसे परिवार के भरण पोषण की चिंता सता रही है।