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जिंदगी की मंझधार में फंसे संगमनगरी के प्रवासी कामगार, गांव में हुनर का नहीं है कोई मोल

Mon, 01 Jun 2020 12:58 AM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
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prayagraj news - फोटो : prayagraj
रोजी रोटी की तलाश में परदेस गए कामगार महामारी से बचने के लिए घर तो लौट आए, लेकिन यहां आकर वे बेरोजगार हो गए हैं। इन कामगारों में कोई दूसरे शहर में रहकर ऑटो चलाता था तो कोई मिल में अथवा शापिंग माल में काम करता था। कुशल श्रमिकों के सामने समस्या यह है कि उनके हुनर के मुताबिक यहां कोई काम नहीं है। अकुशल प्रवासी मजदूर भी आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं, क्योंकि गांवों में मनरेगा के तहत कार्य नहीं हो रहे हैं। मंझधार में फंसे प्रवासियों को यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर जाएं तो जाएं कहां।
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prayagraj news - फोटो : prayagraj
करछना के मझुआ निवासी रामशिरोमणि मुंबई में रहकर सिक्योरिटी गार्ड का काम करते थे। गांव लौटे तो मनरेगा के अलावा कोई रोजगार ढूंढे नहीं मिल रहा है। वहीं इसौटी निवासी रोशन लाल सूरत में साड़ी मिल में काम करते थे।

लॉकडाउन हुआ तो नौकरी चली गई। गांव आने पर उनके हुनर के मुताबिक कोई काम नहीं है। इसी प्रकार इसौटा निवासी अगम लाल पुणे में रहकर ऑटो चलाता था, लेकिन गांव में रोजगार का कोई साधन ही नहीं है। इसी गांव का उमेश कुमार दिल्ली में रहकर शापिंग माल में काम करता था, लेकिन लॉकडाउन होने के कारण नौकरी छूट गयी। गांव में कोई काम नहीं मिल रहा, जिससे उसे परिवार के भरण पोषण की चिंता सता रही है।
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prayagraj news - फोटो : prayagraj
मेजा के डेलौंहा गांव के शिव रक्षा शुक्ला मुंबई में ऑटो चलाते थे। उनका कहना है कि गांव में सिर्फ मनरेगा के तहत काम मिल रहा है, फावड़ा उनसे चलाया नहीं जाता है। पौसिया जवनिया गांव के राजकुमार गुड़गांव में चालक थे। रोजगार न मिलने से खाने तक के लिए लाले पड़ गए हैं।

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prayagraj news - फोटो : prayagraj
फूलपुर के बसनेहटा गांव के रहने वाले रामकुमार यादव मुंबई में रहकर ऑटो चलाते थे। मुंबई से लौटकर आ तो गए लेकिन गांव में कोई काम नहीं मिल रहा है। अडरियां गांव निवासी त्रिभुवननाथ महाराष्ट्र में रहकर एसी मकैनिक का काम करते थे। कोरोना महामारी के बाद खाने के लाले पड़ गए तो गांव आ गए।

उनका कहना है कि यहां मनरेगा को छोड़कर कोई काम नहीं मिल रहा है। इसी प्रकार करूआडीह गांव के रहने वाले दिनेश कुमार यादव मुंबई में अधिकारी की गाड़ी चलाते थे। उनका कहना है कि गांव में कोई काम नहीं मिल रहा है। मनरेगा के तहत भी कोई कार्य नहीं चल रहा जहां वे कुछ कमा सके। ऐसे में उनके सामने भी रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

सोरांव के डिहा गांव के संतोष कुमार पाल, अजस कुमार व ननके बच्चा समेत कई मजदूर घर तो लौट आए, लेकिन कोई काम न मिलने से अब उनके सामने जीविकोपार्जन का संकट खड़ा हो गया है। कारोबार लगभग ठप है, बाजार भी पूरी तरह से नहीं खुले हैं। रोजगार का जरिया न होने से वे किसी तरह घरों में ही दिन गुजार रहे हैं।
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किसी ने बदला काम धंधा तो कोई मुंबई लौटने को तैयार

कोरांव के गांधी नगर निवासी उमाशंकर मुंबई के बांद्रा वेस्ट में रहकर दिन में दवाओं की होम डिलीवरी तथा रात में सिक्योरिटी का काम करते थे। वापस घर लौटने पर मनमुताबिक काम न मिलने के कारण वह दो भैंस खरीद कर दूध बेच रहे हैं। बहादुर शाह नगर मोहल्ले के रहने वाले अर्जुन घाटकोपर, मुंबई में रहकर कॉफी डे में काम करते थे। वह लगभग दस हजार रुपये प्रति महीने बचा लेते थे। घर लौटने के बाद उन्हें कोई काम समझ समझ नहीं आ रहा है। वह मुंबई पुन: वापस जाना चाहते हैं।
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