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हींग की मंडी: यहां अफगान से आती थी हींग, अब चमक रहा जूते का कारोबार, रोचक है इतिहास

Wed, 09 Dec 2020 02:45 PM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
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हींग की मंडी - फोटो : अमर उजाला
ऐतिहासिक धरोहरों की धनी ताजनगरी के स्मारक तो अजूबे हैं ही, यहां की मंडियों, बाजारों और गली-मोहल्लों की कहानियां भी इतिहास का दिलचस्प संकलन है । किसी की कहानी मुगलों के दौर से शुरू होती है तो किसी की इससे भी पुरानी है। हींग की मंडी का किस्सा भी बड़ा दिलचस्प है। अगली स्लाइड्स में पढ़िए हींग की मंडी का रोचक का इतिहास...
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हींग की मंडी में दरगाह - फोटो : अमर उजाला
दौर-ए-मुगलिया में बादशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर के शासनकाल में यहां बड़े पैमाने पर हींग का कारोबार होता था। इसीलिए इस जगह का नाम हींग की मंडी पड़ा। अफगानिस्तान से व्यापारी चमड़े के बड़े थैलों में रखकर हींग लाते थे। इसे खरीदने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे। अब यहां पर जूते का कारोबार होता है।
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हींग की मंडी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
इतिहासकार राज किशोर राजे ने बताया कि अफगान व्यापारी चमड़े के जो थैले लाते थे, उन्हें यहीं छोड़ जाते थे। हींग की मंडी के कुछ लोगों ने उन थैलों से जूते बनाना शुरू किया। इसके बाद यहां जूते भी बेचे जाने लगे। मुगलिया राजधानी जब दिल्ली पहुंच गई तो अफगान व्यापारी वहां जाने लगे। अंग्रेजी हुकूमत के समय में हाथरस में हींग का बड़ा कारोबार शुरू हो गया। हींग की मंडी में हींग की दुकानों के साथ लकड़ी की टाल और जूते की दुकानों की संख्या बढ़ गई।

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हींग की मंडी - फोटो : अमर उजाला
शू फैक्टर्स फेडरेशन के अध्यक्ष गागन दास रामानी ने बताया कि विभाजन के समय हींग की मंडी से काफी लोग पाकिस्तान गए और सिंध और पंजाब से काफी लोग यहां आए। यहां आए लोगों ने जूते का काम शुरू किया। तब जूता कारोबार ने विस्तार ले लिया। आज हींग की मंडी के 19 बाजारों में जूते की 4000 दुकानें हैं। सालाना लगभग 2500 करोड़ का कारोबार है।
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भगत सिंह
भगत सिंह और सुखदेव ठहरे थे : इतिहासकार राज किशोर राजे ने बताया कि जंग ए आजादी के दौरान भगत सिंह और सुखदेव हींग की मंडी में नाम बदलकर ठहरे थे।
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