हिंदू धर्म में नागों को देवता माना गया है और उनकी पूजा करने का विधान है। भविष्यपुराण में बताया गया है पंचमी तिथि के स्वामी नाग होते हैं। पंचमी के दिन नागों की पूजा से नाग दंश का भय दूर होता है और सर्प योनी में जन्म नहीं लेना पड़ता है। इस पुराण में बताया गया है कि सावन के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिप नागों की पूजा विशेष फलदायी होती है। इसलिए इस दिन को नागपंचमी के तौर पर मनाया जाता है। इसी पुराण में नागों के जन्म का रहस्य भी बताय गया है जो हैरान करने वाला है।
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अंडे को देखकर ही पता चल जाता है कौन बनेगा जहरीला नाग, कौन बनेगी नागिन
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cobra
नागों के प्रजनन का समय ज्येष्ठ और आषाढ़ मास होता है। इन दिनों नाग मैथुन करते हैं और वर्षा ऋतु के चार महीने तक सार्पिनी गर्भ धारण करती है।
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नाग के अंडे
कार्तिक का महीना नागिन के प्रसव का समय होता है इन दिनों गर्भवती नागिन दो सौ चालीस अंडे देती है।
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नाग
नाग अपने अंडों को स्वयं खा जाता है। ईश्वरीय कृपा से जो अंडे बच जाते हैं उनसे सांप का वंश आगे बढ़ता है। सोने के समान आभा वाले अंडे से नाग का जन्म होता है।
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लंबी रेखाओं से युक्त अंडों से नागिन उत्पन्न होती है।
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नाग
जो सांप समय से पहले जन्म ले लेते हैं उनका विष मंद होता है वह कम जहरीले होते हैं और उनकी आयु भी कम होती है।
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रिटायर फौजी इंद्र सिंह को साल में तीन से चार बार सर्पदंश की पीड़ा झेलनी पड़ती थी। यह सिलसिला 1991 से शुरू हुआ और 2010 तक चला। वर्ष 1991 में पहली बार इंद्रसिंह को ड्यूटी के दौरान सांप ने डसा। इसके बाद यूपी, पुंछ, राजौरी और किन्नौर समेत कई जगहों पर ड्यूटी के दौरान उन्हें सर्प दंश झेलना पड़ा। मगर हर बार इंद्रसिंह की जान बचती रही।
पुराण के अनुसार नागों में भी नपुंसक पैदा होते हैं। इनके बारे में बताया गया है कि ललिमा युक्त अंडे से जन्म लेने वाले नाग नपुंसक होते हैं।