ganga dussehra
- फोटो : अमर उजाला
गंगा का प्राकट्य
गंगा के प्रादुर्भाव का श्रेय परमपिता ब्रह्मा को जाता है क्योंकि आदिकाल में ब्रह्मा जब जी ने सृष्टि की 'मूलप्रकृति' से निवेदन किया कि हे पराशक्ति ! आप सम्पूर्ण लोकों का आदि कारण बनों, मैं तुमसे ही संसार की सृष्टि आरम्भ करूँगा। ब्रह्मा जी के निवेदन पर उन मूलप्रकृति ने गायत्री, सरस्वती, लक्ष्मी, ब्रह्मविद्या, उमा, शक्तिबीजा, तपस्विनी और धर्मद्रवा इन सात रूपों में अभिव्यक्त हुईं। इनमें सातवीं 'पराप्रकृति 'धर्मद्रवा' को सभी धर्मों में प्रतिष्ठित देखकर ब्रह्मा जी ने उन्हें अपने कमण्डलु में धारण कर लिया, वामन अवतार में बलि के यज्ञ के समय जब भगवान श्रीविष्णु का एक चरणआकाश एवं ब्रह्माण्ड को भेदकर ब्रह्मा जी के सामने स्थित हुआ तब ब्रह्मा ने कमण्डलु के जल से श्रीविष्णु के चरणों की पूजा की। पाँव धुलते समय चरण जल हेमकूट पर्वत पर गिरा, वहाँ से भगवान शंकर के पास पहुँचकर वह जल गंगा के रूप मे उनकी जटा में स्थित हो गया।