दया राम (88) कहते हैं कि यहां से मरीज को पीठ पर या फिर पालकी में बैठाकर सड़क तक पहुंचाना पड़ता है। सरकार की एंबुलेंस सुविधा तक नहीं मिल पाती है। स्कूल कॉलेज और अन्य कर्मचारियों को भारी परेशानियों से गुजरना पड़ता है। अमर उजाला की टीम ने जब क्षेत्र के दुर्गु राम, कांशी राम, दया राम, रतनी देवी, जानकारी देवी, देवकू देवी, देवी राम आदि से बात की तो रुंधे स्वर में बोले ‘अपना सब कुछ भाखड़ा डैम के लिए दे दिया, लेकिन अब पूछने वाला कोई नहीं। हमें तो आज भी ऐसा लगता है जैसे गुलामी में जीवन काट रहे हैं।’