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तस्वीरें: जानिए 'कलम' का इतिहास, कहां से हुई शुरूआत

Sun, 03 May 2015 05:24 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, शिमला
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शब्दों को स्वरूप देने वाली कलम का इतिहास भी बेहद रोचक है। ताम्रपत्रों से लेकर पेपर में लिखने के लिए इस्तेमाल होने वाली कलम और आज के पैन ने लंबा सफर तय किया है। बड़ा दिलचस्प है, जरूर पढ़िए..
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कलम का सफर बहुत लंबा है, माना जाए तो सदियों पुराना। देवताओं में सबसे पहले श्री गणेश भगवान ने महाभारत लिखने के लिए अनोखी कमल का अविष्कार किया। देवताओं को यदि अलग कर दें तो वर्तमान इराक के मेसोपोटामिया में संसार की पहली कलम का अविष्कार हुआ था, तो चलते हैं कलम के इस सुहाने सफर पर, आईए चलते हैं..

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जब महर्षि वेद व्यास ने महाभारत को लिखवाना प्रारंभ किया तो, उनके लिपिक थे  विघ्न विनाशक गणेश। उन्होंने शर्त रखी की रखी वेद व्यास उन्हें लिखते समय एक बार भी, नहीं रोकेंगे।  शर्त मंजूर हो गई। ताड़ लिखने के लिए इ‌कट्ठा कर लिए गए। मगर सवाल उठा कि ऐसी कलम कहां से आएगी जो बिना रूके चलती रहे? गणेश जी ने तुरंत पना एक दंत तोड़ा औरउसके नुकीले भाग से लेखनी बनाकर महाभारत पूरी करके ही छोड़ा।

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देवताओं को यदि अलग कर दें तो दुनिया में सबसे पहले कलम का अविष्कार मेसोपोटामिया अर्थात वर्तमान इराक के निवासियों ने आज से करीब पांच हजार वर्ष पूर्व किया था।
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भारत में इसका श्रेय हड़प्पा और मोहनजोड़ों के चार से पांच हजार वर्ष पूर्व के निवासियों को दिया जाता है।

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अकेले मोहनजोदड़ों शहर में ऐसी तीन हजार लेख युक्त मोहरें मिली हैं। इन मोहरों में ताड़पत्रों से जिस कलम का प्रयोग किया जाता था उसे अंग्रेजी में स्टाइल्स, संस्कृ‌त में वर्तिका और हिंदी में शलाकों अथवा सुई कहते हैं। यह धातु लकड़ी, बांस, हड्डी, हाथी दांत या किसी मजबूत पदार्थ की बनी होती है। अक्षर लिखने के बाद उसमें काल पाउडर भर दिया जाता था ताकि वाक्य उभर सकें।
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ताड़पत्रों, भोजपत्रों में केवल एक ही तरफ लिख पाना संभव था। मगर यह बहुत की कष्टसाध्य, श्रमसाध्य काम था। अलग अलग पत्रों को इकट्ठा करके एक बराबर काटकर पोथी तैयार की जाती थी।

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सबसे पहले लाल रंग, चिमनियों की कालिख, कोयले के चूर्ण, काजल और जली हुई लकड़ी से स्याही तैयार की जाती थी। इसके लिए गेरू और चंदन का भी इस्तेमाल की जाती थी।

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ऐतिसिक युग में अशोक के शिलालेख, स्‍ंतभ लेख सबसे पहले प्रमाण है। यह लेख ब्रहृमी लिपि और पाली भाषा में हैं।

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शुंगकाल में लकड़ी के फटे पर कलम से बारहखड़ी अथवा वर्णमाला लिखी जाती थी। इसका प्रचलन आज भी देश के ग्रामीणों क्षेत्रों में है। इस पर खड़ियां मिट्टी और चूने से लिखा जाता था। अक्षरों को उभारने के लिए लकड़ी की पट्टी को काले रंग से पोता जाता था।

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कागज की खोज का श्रेय चीन को जाता है।  यहां प्रथम सदी में पेपायरस नामक पौधे के रेशे से कागज तैयार किया गया। तभी से इसका नाम पेपर पड़ा।

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सबसे प्राचीनतम कागज पर लिखी पुस्तकें नवीं दसवीं सदी की जैन पांडुलिपियां हैं।

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अब पक्की स्याही की तलाश हुई। कागज में गोंद, जड़ बूटियां और कतिपय सहित दूसरे फल फूल मिलाकर उन्हें पकाकर काले रंग की स्याही तैयार की जाती थी। इसे एक बड़े घड़े, सुराही में रखा जाता था। जब भी आवश्यकता हुई इसे छोटे दवातों में भर लिया जाता था।

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प्राचीन काल में रोशनाई या स्याही का नाम मसि, मसिधानी और मसिधान होता था।

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बाद में सुदृढ कलम की के लिए बाद में मोर पंख, साही का कांटा, लकड़ी, बांस और हाथी दांत का इस्तेमाल किया जाने लगा। इसमें सरकंडा नाम की लकड़ी हल्की भी और सुंदर और मजबूत भी थी।

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फाउंटेन पेन की निब जर्मन आविष्कारक फ्रेडरिक सोननेकन थे।

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पहली फाउंटेन पेन का अविष्कार 953 में मिस्र के खलीफा मोहम्मद अलमुइज ने किया।

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वर्तमान में बॉल पैन का इस्तेमाल किया जाता है। मगर आधुनिकता के इस युग में अब स्मार्ट फोन में एस. पैन स्टालिश का इस्तेमाल होता है। अब वो समय दूर नहीं जब हम अपने बच्चों को पुराने संग्राहलयों में ले जाकर बताएंगे कि किस तरह से स्याही कलम से लिखा जाता था।

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