हिमाचल का जिला लाहौल स्पीति। छह से आठ फीट तक बर्फ। 19 घंटे में 12 किमी सफर। तख्ते पर लेटाकर आग से झुलसे मरीज को अस्पताल पहुंचाकर जिंदगी बचा ली। सभी फोटो: दिनेश जस्पा
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PICS: 19 घंटे मौत के साये में पर मिल गई जिंदगी
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स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर कई तमगे हासिल करने वाले हिमाचल के जनजातीय इलाकों में चिकित्सा सुविधाओं की जमीनी हकीकत कुछ और है। बीमार होने या इमरजेंसी की सूरत में व्यवस्था लोगों पर भारी पड़ रही है। मंगलवार शाम को स्पीति में सुमलिंग निवासी सोनम (40) अपने घर पर स्टोव पर खाना बनाते समय 70 फीसदी झुलस गया। रात किसी तरह घरेलू घटना के बाद आसपास के लोग एकत्रित हुए। उपचार करके निकाली। उसे गंभीर हालत में 12 किलोमीटर दूर काजा स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाना जरूरी था।
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घाटी में छह से आठ फीट तक बर्फ जमी होने के चलते सड़कें और रास्ते बंद हैं। बुधवार सुबह पड़ोस के लगभग 15-16 लोगों ने लकड़ी के एक तख्ते में रस्सी बांधकर पटरा (तख्ता) बनाया और पटरे पर सोनम को लेटाकर उसे खींचते हुए हुए काजा ले चले। सफर लंबा और अंधेरा होने के कारण सोनम को बुधवार शाम को करीब 6 बजे तक रंगरीक गांव में ठहराना पड़ा। कड़ी मशक्कत के बाद भारी बर्फ के बीच उसे रंगरीक, खुरिक और सुमलिंग के युवाओं ने दूसरे दिन वीरवार को सुबह फिर 7 बजे चल पड़े और दोपहर को करीब 3 बजे उसे 12 किलोमीटर दूर काजा अस्पताल पहुंचाया।
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यहां सोनम का इलाज चल रहा है लेकिन सीएचसी होने के चलते उचित उपचार नहीं मिल रहा है। स्पीति के पलजोर बौद्ध, प्रेम सिंह, तंजिन और सोनम ने जिला प्रशासन से अपील की है कि मरीज सोनम को हेलीकॉप्टर से लिफ्ट कर शिमला या अन्य बड़े अस्पताल में शिफ्ट किया जाए। उन्होंने घाटी में बंद पड़ी सड़कों को भी खोलने की मांग की है। सर्दियों में बर्फबारी के चलते हिमाचल के जनजातीय क्षेत्र छह माह तक बर्फ में कैद हो जाते हैं।
लाहौल स्पीति घाटी में चार सीएचसी और एक रीजनल अस्पताल हैं जिनमें मात्र 8 डॉक्टर सेवाएं दे रहे हैं। गंभीर हालत में मरीज को रेफर करने के सिवाय कोई चारा नहीं है। जब भी किसी डॉक्टर को घाटी भेजा जाता है तो वह कोई न कोई बहाना या राजनीतिक जुगाड़ लगाकर ट्रांसफर रुकवा लेता है। हेलीकॉप्टर सुविधा भी तभी मिल पाती है जब मौसम साफ हो। आधी से ज्यादा घाटी में फोन और विद्युत सुविधा ठप है।