ऐसे में सरकार ने बीते दिनों ऊर्जा, पर्यटन, उद्योग और प्रदूषण नियंत्रक बोर्ड को प्रतियोगिता के आयोजन के लिए प्रायोजक तलाशने का जिम्मा सौंपा था। लेकिन कोई भी विभाग प्रायोजक लाने में सफल नहीं हुआ। ऐसे में विधानसभा चुनाव के बाद प्रतियोगिता के आयोजन की घोषणा कर चुकी सरकार ने खुद ही पैसा देने का फैसला लिया है। सरकार प्रतियोगिता के लिए किस मद से पैसा जारी करती है, यह देखना दिलचस्प हो गया है। शेड्यूल खेलों की अनदेखी कर नॉन शेड्यूल खेल पर खर्चे जा रहे करोड़ों रुपये को लेकर आने वाले दिनों में सरकार की मुश्किलें भी बढ़ सकती हैं।