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‘छुक-छुक’ करता निकला 113 साल पुराना स्टीम इंजन, गोरों ने देखा नजारा

Tue, 13 Mar 2018 09:33 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
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रेलवे का 113 साल पुराना इतिहास ‘स्टीम लोकोमोटिव इंजन’ कालका-शिमला हेरिटेज ट्रैक पर उतरा। ‘ग्लोरिअस ट्रेनज ऑफ इंडिया’ टूअर के तहत इंग्लैंड से आए टूरिस्टों ने शिमला से कैथलीघाट तक 22 किलोमीटर लंबे ट्रैक पर स्टीम इंजन से जोड़े गए कोच में सफर किया। सुबह करीब 9:35 बजे रेलवे यार्ड से निकल कर स्टीम इंजन प्लेटफार्म पर पहुंचा। तीखी सीटी और छुक छुक की आवाज सुनते ही रेलवे स्टेशन पर मौजूद यात्री और रेलवे स्टॉफ टकटकी लगाए स्टीम इंजन की ओर देखने लगे। प्लेटफार्म पर पहुंचने के बाद स्टीम इंजन में कोच जोड़े गए और इसके बाद इंग्लैंड से आए सैलानी कोच में सवार हो गए। 
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स्टीम इंजन के साथ कोचों में शिवालिक एक्सप्रेस की आरामदायक सीटें लगाई थीं। स्टीम इंजन को चलाने के लिए तीन कर्मचारियों की तैनाती की गई थी। ड्राइवर ने इंजन स्टार्ट किया, फर्स्ट फायरमैन ने कोयला डाल कर स्टीम तैयार की और सेकेंड फायरमैन ने केबिन तक कोयला पहुंचाया। 9:55 बजे स्टीम लोकोमोटिव इंजन शिमला से कैथलीघाट की ओर रवाना हो गया। स्टीम इंजन के रवाना होने से पहले सैलानियों ने शिमला रेलवे स्टेशन की खूबसूरती को अपने कैमरों में कैद किया।
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शिमला से कैथलीघाट तक स्टीम इंजन के टूअर का आयोजन ‘ट्रेवल पलज इंडिया’ की ओर से किया गया। ‘ट्रेवल पलज इंडिया’ के डायरेक्टर अमित चोपड़ा ने बताया कि टूअर को ‘ग्लोरिअस ट्रेनज ऑफ इंडिया’ का नाम दिया गया है। इससे पहले उनकी कंपनी ‘रेलवेज ऑफ द राज’ नाम से टूअर का आयोजन कर चुकी है। शिमला से पहले ये सैलानी दिल्ली से रेवाड़ी फेरी क्वीन ट्रेन में सफर कर चुके हैं। शिमला के बाद दार्जिलिंग में ट्वॉय ट्रेन में सफर का प्रोग्राम है।

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शिमला से कैथलीघाट तक स्टीम इंजन के सफर का आनंद लेने वाले स्टीफन गैड, हस्लन जॉन और क्लेयर शेप्पी रिटायर्ड आफिसर हैं। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वजों ने भी हैरिटेज ट्रैक पर स्टीम इंजन में सफर किया था। अपने पूर्वजों की यादों को री-लिंक करने के लिए उन्होंने स्टीम इंजन में सफर की योजना बनाई। कहा कि ट्रेन में घूमना उनकी हॉबी है, शौकिया तौर पर वह हेरिटेज रेलवे में घूमते हैं। ‘ग्लोरिअस ट्रेनज ऑफ इंडिया’ टूअर में भी उन्हें खूब आनंद आ रहा है। सैलानियों ने रेलवे स्टेशन के प्लेट फार्म पर स्टीम इंजन के पहुंचने से लेकर रेलवे स्टेशन से रवाना होने तक पल पल के फोटो और वीडियो बनाए। बहुत से सैलानी रेलवे स्टेशन से ट्रेन गुजरने की भी वीडियो बनाते रहे। इसके बाद टैक्सियों में सवार होकर अगले रेलवे स्टेशन से ट्रेन में सवार हुए।
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रेल का पर्याय मानी जाने वाली छुक-छुक की आवाज सिर्फ स्टीम इंजन से पैदा होती है। स्टीम इंजन में भाप के पिस्टन में आगे पीछे चलने और बाहर निकलने से छुक-छुक की आवाज पैदा होती है। स्टीम इंजन में बजने वाली सीटी भाप के दबाव से ही बजती है। डीजल इंजन के मुकाबले स्टीम इंजन की सीटी ज्यादा तीखी और दूर तक सुनाई देने वाली होती है। इंजन में लाइट भी स्टीम से ही जलती है। विदेशी सैलानियों के लिए ट्रैवल पलज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने डेढ़ लाख में स्टीम इंजन बुक करवाया था। तीन कोचों के साथ स्टीम इंजन ने शिमला से कैथलीघाट तक 22 किलोमीटर का सफर तय किया। शिमला-कालका रेल लाइन विश्व धरोहर का दर्जा पाने वाली तीसरी रेल लाइन है। 8 जुलाई 2008 को यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर का दर्जा दिया है। दार्जिलिंग रेलवे और नीलगिरि रेलवे को भी विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है।
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96 किलोमीटर में 102 सुरंगें और 800 पुल
1903 में बिछाई गई 96 किलोमीटर कालका से शिमला तक रेल लाइन में 102 सुरंगें, 800 पुल, 919 मोड़ और 18 रेलवे स्टेशन हैं। समुद्र तल से ट्रैक की ऊंचाई 2800 फुट से लेकर 7 हजार फुट है। 

स्टीम इंजन का इतिहास आंकड़ों की जुबानी
113 साल पुराना है केसी-520 स्टीम लोकोमोटिव इंजन
1905 में अंग्रेजों ने शिमला से कैथलीघाट के बीच चलाया
1971 के बाद 30 सालों तक वर्कशॉप में खड़ा रहा
2001 में दोबारा बना कर तैयार किया गया
41 टन है इंजन का वजन
80 टन तक खींचने की क्षमता
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