वे अब महज रसोईघर की शोभा भर नहीं हैं। घर की चहारदीवारी में कैद अबला भी नहीं हैं। संकीर्ण मानसिकता की दहलीज को लांघ चुकी हैं वो। उन्होंने अपना आकाश तलाश लिया है। ...और उस आकाश पर सफलता की इबारत भी लिख रही हैं। जी हां, हमारी बेटियां अब इतिहास रच रही हैं। कभी बेटियों के जन्म लेने पर मातम मनाने वाले परिवार आज उनकी सफलता का जश्न मना रहे हैं। बेटों को खानदान का चिराग कहने वाले लोग आज बेटियों के हौसले की रोशनी से जगमगा रहे हैं। आज अंतरराष्ट्रीय बेटी दिवस के मौके पर हम अपने शहर की ऐसी ही कुछ बेटियों के बारे में आपको बताने जा रहे हैं जिन्होंने अपनी हिम्मत और मेहनत के बलबूते यह साबित कर दिया कि वे बेटों से कहीं बेहतर हैं। पेश है एक रिपोर्ट :
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नंदिनी दिवाकर, आरडीएसओ आलमबाग
- फोटो : amar ujala
मां-बाबा ने कपड़े प्रेस कर पढ़ाया, अब हमारी बारी
नंदनी दिवाकर, आरडीएसओ आलमबाग
शेफ कंसल्टेंट नंदनी दिवाकर ने भी मां-पिता जी की कड़ी मेहनत से सीख लेते हुए अपने परिवार का नाम रोशन किया। वे बताती हैं कि पांच बहनों के परिवार में चौथे नंबर की होने के साथ कुछ ऐसा करने की चाहत हुई जिससे पिता जी का सहारा बनूं। वे बताती हैं कि उनके पिता ने कपड़ों पर प्रेस करके हम बहनों को पढ़ाया जिससे आज हम सब बहनें सेल्फ डिपेंड बन सकीं। नन्दनी ने बताया कि एक ऑनलाइन कॉन्टेस्ट में मेरी रेसेपी को जर्मन एयरलाइंस के लिए चुना गया। यह मेरे परिवार व मेरी माता-पिता के लिए गर्व की बात थी। वे बताती हैं कि इस वक्त मेरी छोटी बहन पीएचडी कर रही है और मेेरी बड़ी बहनें एक अधिवक्ता तो दूसरी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षिका हैं। वहीं एक बहन पीएनबी बैंक में हैं। इसके अलावा एक बहन उनकी पीसीएस की तैयारी कर रही हैं। नंदनी ने बताया कि उनके माता-पिता आज भी अपना पुराना काम करते हैं। उन्हें उस काम को करते रहने की आदत पड़ चुकी है। वे बताती हैं कि मेरे पिता जी ने 14-14 घंटे कपड़े प्रेस कर हम सब को पढ़ाया। अब हम सब उनका सहारा बनना चाहती हैं।
पिता की बीमारी के बाद संभाला घर वर्षा श्रीवास्तव, पेपर ज्वेलरी डिजाइनर, वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर
मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मीं पेपर ज्वेलरी डिजाइनर व समाज सेवी वर्षा बताती हैं कि 16 घंटे तीस मिनट लगातार पेपर नेकलेस सेट बनाने का वर्ल्ड रिकॉर्ड मेरे नाम है। इससे पहले नेशनल रिकॉर्ड के साथ इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी उनकी मेहनत दर्ज हो चुकी है। वे बताती हैं कि स्नातक कर रही थी, इसी दौरान पिता जी का स्वास्थ्य ऐसा बिगड़ा की डॉक्टर्स ने जवाब दे दिया। बड़ी बीमारियों से ग्रसित मेरे पिता के बिस्तर पकड़ लेने के बाद घर की बड़ी बेटी होने से सारा जिम्मा मुझ पर आ गया। घर संभालने के साथ अपना कारोबार शुरू करने की ख्वाहिश के चलते पेपर ज्वेलरी का काम शुरू किया। साथ ही एमबीए भी पूरा करने की ठानी। वे बताती हैं कि इस वक्त वे अपने परिवार को अच्छे से संभाल रही हैं। उन्होंने बताया कि व्यवसायी पिताजी सात साल से पूरी तरह बेड पर हैं। उनके लंबे इलाज के खर्च के बीच कम पैसों में रोजगार तलाशने की चाहत ने उनमें पेपर से ज्वेलरी का जज्बा पैदा किया। पिता जी के इलाज व ख्याल के साथ छोटे भाई की शिक्षा का पूरा ख्याल रखते हुए उसके भविष्य को बेहतर बनाना चाहती हैं। उनका कहना है कि मैंने अपने जीवन में काफ ी उतार चढ़ाव देखे हैं। कुछ करने की चाहत और देश को कुछ दे जाने की आरज़ू मुझे सदा प्रेरित करती रहती है।
खुद संभाला पूरे परिवार का जिम्मा
डॉ. रिचा आर्या, भातखंडे में कथक टीचर
एक साल पहले पिता जी गुजर गए, उनके जाने से सब कुछ रुक सा गया। दर्शनशास्त्र में पीएचडी कर चुकीं डॉ. रिजा आर्या बताती हैं कि पिताजी सचिवालय में समीक्षा अधिकारी थे और पिछले साल हम सब को छोड़कर चले गए। ऐसे में सारे परिवार की जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई, इसके बाद लगातार संघर्ष करते हुए पिता जी के सपनों को साकार करने के साथ परिवार की जिम्मेदारी संभाली। अभी भातखंडे में टीचर के पद पर होते हुए सामाजिक कार्य को लेकर भी आगे आई क्योंकि मेरे पिता को समाजसेवा से लगाव था। उनके सपनों को साकार करने केलिए दर्शनशास्त्र से पीएचडी की और फिर एनजीओ से जुड़ी और समाज के कार्य किए। इसके लिए उन्हें मैं हूं बेटी अवॉर्ड के साथ चबूतरा श्री सम्मान के साथ कई अन्य सम्मान भी मिले। उन्होंने बताया कि लविवि से दर्शनशास्त्र में पीएचडी और भातखंडे से निपुण होने से उन्हें आज अपने पिता जी के सपने को साकार करने का बल मिल रहा है। उनका अब तीन लोगों के इस परिवार के पूरे ध्यान के साथ वे समाज के लिए कुछ करने की अपने पिता की इच्छा को पूरा करने में जुटी हैं।
पाप की नौकरी छूटी तो बनी परिवार का सहारा
विजया कुमारी, एथलीट
सीआईएसएफ में हेड कांस्टेबल एथलीट विजया कुमारी का संघर्ष उनके पिता की नौकरी छूटने के साथ शुरू हुआ। वे बताती हैं कि जब पिताजी की नौकरी नहीं रही तो उनके परिवार के लिए यह कठिन घड़ी थी। परिवार में बड़ी बहन, छोटा भाई और मम्मी पापा को सहारा देने की चाहत ने उन्हें स्टेट से इंटरनेशनल खेलने का जज्बा दिया। अब वे सीआईएसएफ में सरकारी नौकरी में रहते हुए अपने परिवार का सहारा बन चुकी हैं। वे बताती हैं कि बहन की शादी की चिंता के साथ छोटे भाई की फिक्र है। विजया बताती हैं कि मई 2018 में इंटरनेशनल लेवल पर कोलंबो (श्रीलंका) में 100 मीटर दौड़ में हिस्सा लिया। अभी उन्हें फ्री मेमोरियल गोल्ड मेडल बेस्ट एथलीट 2018 मिला। उन्होंने बताया कि जौनपुर से केडी सिंह स्टेडियम तक के सफर को और आगे बढ़ाना चाहती हैं। नौकरी के साथ वे अपना अभ्यास जारी रखे हुए हैं और आगे भी खेलना चाहती हैं ताकि जिन परिस्थितियों को उन्हें सहना पड़ा वे उनके भाई व बहन के सामने न आए। उन्होंने बताया कि मेरे पिता बिहार में अपने गांव में खेती किसानी के काम में लग गए हैं। उन्हें गर्व है कि मेरी बेटी फोर्स में है। उन्होंने बताया कि वे अब वर्ल्ड लेवल पुलिस मीट को लेकर चाइना जाने वाले दल में शामिल होने के लिए प्रयासरत हैं।